धीरूभाई अंबानी की बायोग्राफी: सक्सेस स्टोरी

20 अप्रैल,2022

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धीरूभाई अंबानी के जीवन की पूरी कहानी जानें और समझें कि उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज को सिरे से कैसे खड़ा किया।

गुजरात के चोरवाड़ में 28 दिसंबर, 1932 को जन्मे धीरूभाई अंबानी मशहूर उद्योगपति बन गए जिन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज की स्थापना की। पेट्रोकेमिकल्स, टेक्सटाइल्स, पावर और कम्युनिकेशन के क्षेत्र में इसका दबदबा है। उनके नेतृत्व में, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भारत के सबसे बड़े निर्यातक के रूप में कार्य किया और वह पहली भारतीय कंपनी थी जिसे निजी तौर पर फॉर्च्यून 500 जगह मिली थी। धीरूभाई अंबानी की सक्सेस स्टोरी से जुड़ी बारीक जानकारी के लिए आगे पढ़ें।

शुरूआती जीवन और करियर

अंबानी का जन्म 28 दिसंबर, 1932 को एक मामूली परिवार में हुआ था और वह पांच बच्चों में से तीसरे थे। उनके पिता स्कूल शिक्षक थे, और उनकी माँ गृहिणी थीं। धीरूभाई जब 17 साल के हुए , तो उन्होंने अदन का रुख किया ताकि वह अपने भाई के साथ काम कर सके। उन्होंने स्वेज़ नहर के पूर्व में स्थित सबसे बड़ी अंतरमहाद्वीपीय व्यापारिक कंपनी - ए. बेसे एंड कंपनी - में क्लर्क के रूप में अपना करियर शुरू किया।  यहां अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने ट्रेडिंग, एकाउंटिंग की पेचीदगियाँ और प्रासंगिक बिज़नेस कौशल सीखे। हालांकि, 1958 में धीरूभाई भारत वापस आ गए और मुंबई में एक दुकान खोली।

रिलायंस की स्थापना 

मुंबई में, धीरूभाई ने बिज़नेस खोलने की ठानी और यह फैसला उन्हें मसालों का व्यापार की ओर ले गया। इस नए-नवेले बिज़नेस वेंचर को रिलायंस कमर्शियल कॉर्पोरेशन कहा जाता था। जल्द ही उन्होंने अपनी ऑफरिंग में दूसरी चीज़ें शामिल कर लीं और एक ऐसी स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल किया जिसके तहत उन्हें अपने जैसी कंपनियों से बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के बजाय कम मुनाफे पर बेहतर क्वालिटी के प्रोडक्ट की पेशकश की। इस स्ट्रेटेजी से उन्हें फायदा हुआ और उनका बिज़नेस ने छलांग लगाईं। धीरूभाई अंबानी को जब महसूस हुआ कि उनका कॉर्पोरेशन उक्त कमॉडिटी के मामले में चरम पर पहुँच गया है, तो उन्होंने सिंथेटिक टेक्सटाइल का बिज़नेस शुरू कर दिया। उनकी ओर से बैकवर्ड इंटीग्रेशन सक्रिय रूप से 1966 में शुरू हुआ जब उन्होंने कपड़े की पहली मिल खोली। डायवर्सिफिकेशन के साथ यह बैकवर्ड इंटीग्रेशन ऐसा तरीका बना रहा जिसके ज़रिये धीरूभाई अंबानी ने रिलायंस की बिज़नेस डीलिंग बढ़ाई। इससे अंततः यह पेट्रोकेमिकल्स क्षेत्र की विशाल कंपनी बन गई। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि रिलायंस ने खुद को इस क्षेत्र तक ही सीमित रखा। बजाय यहाँ थमने के, प्लास्टिक और बिजली उत्पादन को इसके बिज़नेस डीलिंग और ऑपरेशन में जोड़ा गया।

रिलायंस का पब्लिक ऑफर आया 

धीरूभाई अंबानी ने 1977 में रिलायंस को पब्लिक किया, जब नेशनलाइज्ड बैंक उन्हें फंड करने से कतराते थे। कठोर सरकारी नियमों और नौकरशाही मज़बूत पकड़ वाली इकॉनमी को साधने में महारत की उस समय सराहना नहीं हुई थी। नतीजतन, उन पर भ्रष्ट होने और अपने काम के लिए राजनीतिक हेराफेरी करने का आरोप लगाया गया। हालांकि, इन्वेस्टर्स का भरोसा कायम रहा और यह आंशिक रूप से इसलिए था कि कंपनी ने अपने निवेशकों को शानदार डिविडेंड दिया। धीरूभाई के विज़न और पब्लिक परसेप्शन ने ही इन्वेस्टर्स से कंपनी की अपील को जोड़ा। एनुअल जनरल मीटिंग आयोजित करने के उनके करिश्मे ने भारतीय निवेशकों को चकाचौंध कर दिया था। इसमें हजारों लोग शामिल होते थे। इन मीटिंग में से कई स्टेडियमों में होती थीं और इन्वेस्टर भारी संख्या में धीरूभाई को सुनने आते थे। 

 इसलिए, धीरूभाई को औसत भारतीय इन्वेस्टर्स और शेयर बाजार के बीच संबंध बनाने का श्रेय दिया गया। रिलायंस द्वारा आयोजित एनुअल जनरल मीटिंग इतनी लोकप्रिय थीं कि उन्हें अक्सर इस तरह से प्रसारित करने की आवश्यकता होती थी कि जो लोग इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं आ सकते थे, वे भी इस विशाल कंपनी की गतिविधियों से अवगत रह सकें।

अंतिम दौर

अंबानी जब 1980 के दशक में बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगे और उन्हें लगने लगा कि उनके बेटों ने रिलायंस चलाने के लिए बिज़नेस का कौशल हासिल कर लिया है, तो उन्होंने अपना रोज़मर्रा का काम उन्हें सौंप दिया। अनिल और मुकेश अंबानी ने भी यही किया और मुकेश अंबानी ने कंपनी को धीरूभाई के समय से आगे बढ़ाया। आज, समूह को रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड कहा जाता है और इसकी ऑफरिंग मकन्विनिएन्स शॉपिंग, डाइनिंग और हॉस्पिटैलिटी, इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग और बैटरी स्वैपिंग स्टेशन, फ्लीट मैनेजमेंट सॉल्यूशन, इंटीग्रेटेड पेमेंट प्लेटफॉर्म, जेट/एविएशन टर्बाइन फ्यूल, ट्रांसपोर्टेशन फ्यूल, ऑटो एलपीजी और लुब्रिकेंट शामिल हैं। धीरूभाई अंबानी को यह देखने को नहीं मिला कि रिलायंस ने अपने बेटों के नेतृत्व में किस हद तक विस्तार किया, लेकिन यह 2002 में उनकी मृत्यु के समय भी बेहद सफल बिज़नेस था। हालांकि यहाँ धीरूभाई अंबानी की कहानी को संक्षेप में बताया गया है, लेकिन भारतीय इकॉनमी और वर्कफोर्स में उनके योगदान के लिए उन्हें कई तरह के पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

 

डिस्क्लेमर: इस ब्लॉग का उद्देश्य है सिर्फ जानकारी देना न कि कोई सलाह/इन्वेस्टमेंट के बारे में सुझाव देना या किसी स्टॉक की खरीद-बिक्री की सिफारिश करना।

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