स्टॉक डिविडेंड पर टैक्स कैसे लगता है?

07 Sep, 2021

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इस आर्टिकल में यह समझाने की कोशिश की गई है कि डिविडेंड क्या है, इस पर कैसे टैक्स लगता है और क्या कुछ जुड़ा है।

परिचय 

पिछले साल 2020 के फिनांस एक्ट में सेक्शन 115-ओ के तहत डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स ख़त्म कर दिया गया।इसके बाद, टैक्सेशन का क्लासिकल सिस्टम प्रचलन में आया जिसके तहत डिविडेंड पर टैक्स लगाया गया और टैक्स की ज़िम्मेदारी इन्वेस्टर पर डाली गई।  अप्रैल 2020 के बाद से डिस्ट्रीब्यूट किये गए डिविडेंड पर इन्वेस्टों पर टैक्स लगाया जाता है और ये डिविडेंड जारी करने वाली घरेलू कंपनियों पर टैक्स नहीं लगाया जाता है। 

डिविडेंड की परिभाषा

डिविडेंड आमतौर पर कंपनी के एक्युमुलेटेड प्रॉफिट के रूप में देखा जाता है जिसे शेयरहोल्डर्स बांटा जाता है।  इन्कम टैक्स एक्ट के सेक्शन 2 (22) के अनुसार, डिविडेंड के दायरे में ये चीज़ें शामिल हैं । 

  • एक्युमुलेटेड प्रॉफिट जो शेयरहोल्डर्स को बांटे जाते हैं उससे कंपनी एसेट रिलीज़ होता है
  • एक्युमुलेटेड प्रॉफिट से शेयरहोल्डर्स को डिबेंचर या डिपॉजिट सर्टिफिकेट देना और कंपनी एक्युमुलेटेड प्रॉफिट से तरजीही शेयरहोल्डर्स को बोनस शेयर जारी करना
  • शेयरहोल्डर्सों को एक्युमुलेटेड प्रॉफिट के लिक्विडेशन का वितरण
  • शेयरहोल्डर्स को बांटी गई पूंजी में कमी से एक्युमुलेटेड प्रॉफिट
  • कंपनी के एक्युमुलेटेड प्रॉफिट से शेयरहोल्डर्स को दिया गया एडवांस या लोन

स्टॉक डिविडेंड पर टैक्स

अब क्लासिकल सिस्टम लागू है इसलिए इसे नियंत्रित करने वाले प्रावधान भी सक्रिय हो गए हैं और नॉन-रेजिडेंट वगैरह के लिए लागू ट्रीटी रिलीफ के साथ सोर्स पर लगने वाले डिडक्शन टैक्स और डिडक्शन ऑफ़ एक्स्पेंसेज की भी मंज़ूरी हैं। 

शेयरहोल्डर को इनका ज़रूर पालन करना चाहिए-

टैक्स के डॉक्यूमेंट में जिनका वर्णन 'अन्य स्रोत' के तौर पर होता है उसे अब उन्हें इन्वेस्टमेंट के माध्यम से होने वाली डिविडेंड इन्कम के तौर पर लिस्ट करना होता है और यह स्लैब दरों को ध्यान में रखते हुए लागू होता है। किसी भी साल घोषित, बांटे गए या भुगतान किए गए डिविडेंड में से जो भी पहले होता है उस पर इन्कम टैक्स एक्ट के अनुसार टैक्स देना होता है।

यदि किसे साल म्यूचुअल फंड से या डिविडेंड से होने वाली आय 5000 रूपये से अधिक होती है तो रेजिडेंट  शेयरहोल्डर्स को 10 प्रतिशत टीडीएस देना होगा। यह डिडक्ट किया गया टैक्स टैक्सपेयर की अंतिम टैक्स लायबिलिटी के ज़रिये क्रेडिट के रूप में उपलब्ध होगा जब वे अपना इन्कम टैक्स रिटर्न भर रहे होंगे।

नॉन-रेजिडेंट शेयरहोल्डर्स को 20 प्रतिशत टैक्स अदा करना होता है जो कि बेनिफिशियल टैक्स ट्रीटी की दरों पर निर्भर है, यदि वे उपलब्ध हैं तो। नॉन-रेजिडेंट शेयरहोल्डर्सों टैक्स रेजीडेंसी सर्टिफिकेट और डेक्लेरेशन ऑफ़ बेनेफिसिअल ओनरशिप से लेकर फॉर्म 10 एफ तक बहुत से डॉक्यूमेंट जमा करने होते हैं ताकि टैक्स ट्रीटी का फायदा उठाया जा सके। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो डिविडेंड देने वाली घरेलू कंपनी बेनिफिशियल ट्रीटी की ध्यान में रखे बिना टैक्सों में कटौती कर सकती है। ऐसी स्थिति आने पर, नॉन-रेजिडेंट भारत में अपना टैक्स रिटर्न भरते समय कमतर टैक्स ट्रीटी का दावा कर सकते हैं।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि नॉन-रेजिडेंट शेयरहोल्डर्स को वैसी स्थिति में टैक्स रिटर्न नहीं भरने की अनुमति है जब कि उनकी कुल इन्कम डिविडेंड से हुई हो या किसी पैसिव इन्कम से हुई हो जिसे एक्ट में तय दर के आधार पर ब्याज और टैक्स के रूप में निर्धारित गया है। इसका मतलब है कि यदि कमतर टैक्स ट्रीटी दर का दावा किया जाता है, तो नॉन-रेजिडेंट को इन्कम रिटर्न दिखाने की ज़रुरत होती है जिनमें उनकी डिविडेंड इन्कम और उस पर हुए टैक्स डिडक्शन का ज़िक्र ज़रूरी है।

डिडक्ट जाने वाले एक्स्पेंसेज़-

पिछले साल से लागू टैक्स कानूनों के तहत टैक्सपेयर्स को उन इंटरेस्ट एक्स्पेंडीचर डिडक्शन का क्लेम कर सकते है जो उन्होंने डिविडेंड इन्कम के ज़रिये किया, और इस इन्कम का अधिकतम 20 प्रतिशत टैक्स योग्य होता है। बैंकर या ब्रोकर को दिए गए कमीशन या रेम्युनेरेशन के तौर पर हुए अन्य एक्स्पेंसेज़ को भी क्लेम के रूप में मंजूरी हैं।

इसके अलावा, टैक्सपेयर से उम्मीद की जाती है कि यदि किसी साल उनके लिए 10,000 से अधिक टैक्स देने की संभावना बनती हो तो वे एडवांस में अपने टैक्स की क़िस्त जमा करें। यदि टैक्स पेमेंट में न हुआ हो या कम हुआ हो तो जितनी राशि कम हुई हो उस पर ब्याज लगाया जाता है। इसका मतलब है कि डिविडेंड से होने वाली इन्कम की प्रकृति और अडवांस टैक्सत के सम्बन्ध में सटीक आंकड़ों से जुड़ी मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए, कानून ने इन एडवांस टैक्स के भुगतान में कमी के सम्बन्ध में प्रावधान किये गए हैं। ये तय करते हैं कि डिविडेंड इन्कम के कारण कोई शॉर्टफॉल हो तो ब्याज लागू नहीं होगा बशर्ते टैक्सपेयर बाद के सारे एडवांस टैक्स का भुगतान में पूरी तरह करे।

घरेलू कंपनियों को डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स नहीं देना होता है, फिर भी वह सेक्शन 194 के तहत शामिल टैक्स डिडक्शन के लिए उत्तरदायी हैं।  सेक्शन 194 में कहा गया है कि यदि किसी वित्त वर्ष में डिविडेंड 5000 रूपये से अधिक दिया जाना हो तो भारतीय कंपनियाँ रेजिडेंट शेयरहोल्डर्स को दिए जाने वाले डिविडेंड पर 10 प्रतिशत टैक्स डिडक्ट करेंगी। इसका मतलब है कि लाइफ इंश्योरेंस कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया (या एलआईसी) और जनरल इंश्योरेंस कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया (जीआईसी) या कोई अन्य इंश्योरेंस कंपनी अपने शेयरों या जिसपर फुल बेनेफिशियल ब्याज लागू होता है, उस पर टैक्स नहीं लगता। इसका मतलब है कि ऐसी स्थिति में जिसमें किसी नॉन-रेजिडेंट या विदेशी कंपनी को डिविडेंड देना हो तो, सेक्शन 195 के मुताबिक सम्बद्ध डीटीएए के अनुरूप टैक्स डिडक्ट किया जाएगा।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, घरेलू कंपनियों को अब डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स नहीं देना है और डिविडेंड भुगतान पर टैक्स देने की ज़िम्मेदारी अब उन शेयरहोल्डर्स पर है जिन्हें ये डिविडेंड मिलना है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1. डिविडेंड क्या हैं?
उत्तर1 डिविडेंड एक कंपनी द्वारा अर्जित प्रॉफिट है जो उसके शेयरहोल्डर्स के बीच बांटा जाता है। 

प्रश्न 2. क्या डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स अब भी लगता है?
उत्तर2. धारा 115-ओ के तहत डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स पिछले साल ख़त्म कर दिया गया है और अब यह नहीं लगता है।

प्रश्न3. क्या एनआरआई को डिविडेंड पर टैक्स रिटर्न भरने की अनुमति है?
उत्तर4. एनआरआई को डिविडेंड पर टैक्स रिटर्न भरने की अनुमति तभी दी जाती है जब तक कि उनकी कुल इन्कम केवल डिविडेंड इन्कम(या पैसिव इन्कम) ही न हुई हो। यदि एनआरआई की इन्कम पूरी तरह से डिविडेंड इन्कम या इंटरेस्ट जैसी पैसिव इन्कम हो, तो इस पर टैक्स एक्ट में तय दर पर विदहेल्ड किया गया है।

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