लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट

04 फरवरी,2022

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कंपनी की बैलेंस शीट पर एसेट के तहत दर्ज़ लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट के बारे में उलझन में है? यहां आपको कंपनी के फाइनांस के इस कॉम्पोनेन्ट के बारे में जानना चाहिए।

इन्वेस्टर के रूप में, आपने शायद अपने पोर्टफोलियो में लॉन्ग टर्म के इन्वेस्टमेंट से जुड़ी सारी खूबियों और खामियों , मुनाफे और नुकसान के बारे में सुना होगा। हालाँकि, यह ब्लॉग लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट के बारे में नहीं है जो आप - इन्वेस्टर - करेंगे, बल्कि किसी कंपनी द्वारा किए गए लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट, या उन कंपनियों के लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट के बारे में है जिनमें आप इन्वेस्ट कर सकते हैं, या पहले ही इन्वेस्टमेंट कर चुके हैं।

शेयर बाजार का गंभीर इन्वेस्टर, ऐसे शेयर चुनना चाहता है जिन पर वे लॉन्ग टर्म में बढ़त का भरोसा कर सकते हैं, और वह आमतौर पर शेयर बाजार में लिस्ट कंपनियों की बैलेंस शीट के ज़रिये फैसला करना चाहेगा ताकि मजबूत फाइनांस वाले शेयर चुन सके, और इसलिए आर्थिक रूप से मजबूत बने रहा जा सके।

यदि आप किसी कंपनी की बैलेंस शीट के ज़रिये फैसला कर रहे हैं तो आप देखेंगे कि एसेट लेजर का एक अकाउंट है जिसमें लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट की बात की गई है। दरअसल, कंपनियां भी इन्कम के अतिरिक्त ज़रिये के तौर पर इन्वेस्टमेंट कर सकती हैं।

किसी कंपनी की ओर से किया जाने वाला लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट क्या हैं?

कोई कंपनी दूसरी कंपनी के शेयरों में इन्वेस्टमेंट कर सकती है, यानी वह लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट शेयर चुन सकती है; वह सरकारी या कॉरपोरेट बॉन्ड, रियल एस्टेट में इन्वेस्टमेंट कर सकती है और वह मनी मार्केट फंड, कमर्शियल पेपर और ट्रेजरी बिल में भी इन्वेस्टमेंट कर सकती है।

आमतौर एक साल से अधिक समय का कोई भी इन्वेस्टमेंट लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट हो सकता है। उन्हें साल भर बाद या बहुत बाद में बेचा जा सकता है, या हो सकता है बिल्कुल भी नहीं बेचा जाए। साल भर से कम समय के लिए रखे गए किसी भी इन्वेस्टमेंट को शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट कहा जाएगा।

आप शायद सोच रहे हैं कि इन्वेस्टमेंट के लिहाज़ से आपके लिए इसका क्या मतलब है, और बैलेंस शीट पर लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म के इन्वेस्टमेंट को अलग करने की क्या ज़रुरत है।

बैलेंस शीट पर असर

लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट के मूल्य में बढ़ोतरी और कमी कंपनी की बैलेंस शीट पर नहीं दिखती है, इसके उलट शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट के मामले में जहां मूल्य में कमी दिखती है, लेकिन बैलेंस शीट में वृद्धि तब तक दर्ज़ नहीं की जाती है जब तक इन्वेस्टमेंट बेचा या भुनाया नहीं जाता है।

ऐसा इसलिए है कि इस साल की बैलेंस शीट पर शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट के मूल्य का असर होता है, क्योंकि इसे इस साल बेचा / भुनाया जाना है। हालांकि, लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट का मूल्य बिक्री या मैच्योरिटी पर ही स्पष्ट होगा। केवल इन्वेस्ट की गई राशि लॉन्ग टर्म के इन्वेस्टमेंट के तौर पर बैलेंस शीट पर दिखाई देगी।

हालांकि, हेल्ड-टू-मैच्योरिटी इन्वेस्टमेंट के लिए नियम थोड़े अलग हैं। हेल्ड-टू-मैच्योरिटी इन्वेस्टमेंट में स्टॉक शामिल नहीं है, क्योंकि शेयर अनिश्चित काल तक रखे जा सकते हैं। हेल्ड-टू-मैच्योरिटी इन्वेस्टमेंट की मैच्योरिटी की तारीख तय होनी चाहिए। समय के साथ इस तरह के इन्वेस्टमेंट पर कंपनी को हासिल होने वाला किसी भी ब्याज, प्रीमियम या छूट को समय के साथ इन्वेस्टमेंट राशि से घटा लिया जाता है। इसे अमॉर्टाइज़ेशन कहते हैं। बांड और अन्य ऋण योजना की हेल्ड-टू-मैच्योरिटी इन्वेस्टमेंट मैच्योरिटी तक रखे जाने वाले इन्वेस्टमेंट के तहत आयेंगे। माना लिया जाता है कि कंपनी मैच्योरिटी तक उन्हें रखने की योजना बना रही है। उन्हें नॉन करेंट एसेट के रूप में जाना जाता है।

लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट की एक और उप-श्रेणी है अवेलेबल-फॉर-सेल इन्वेस्टमेंट। कई बार इस तरह के इन्वेस्टमेंट शॉर्ट टर्म होते हैं, लेकिन इस किस्म लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए, हम उन इन्वेस्टमेंट को देख रहे होते हैं जिन्हें कंपनी की भविष्य में (एक साल से अधिक समय में) बेचने की योजना है।  ऐसे इन्वेस्टमेंट के लिए बैलेंस शीट में शुरुआत में उनकी लागत दिखेगी। फिर, हर रिपोर्टिंग अवधि के अंत में, ऐसे इन्वेस्टमेंट का उचित मूल्य दर्ज किया जाएगा और अपडेट किया जाएगा। यहां तक कि ऐसे इन्वेस्टमेंट से अप्राप्त आय और नुकसान को भी अन्य कॉम्प्रिहेंसिव इन्कम के रूप में जाना जाता है। इस श्रेणी में वे बांड शामिल हो सकते हैं जिनके बारे में हमने पिछली श्रेणी में बात की थी यदि कंपनी की मंशा मैच्योरिटी से पहले उन्हें बेचने की है। इस श्रेणी को कभी-कभी ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध एसेट के रूप में भी जाना जाता है।

इन्वेस्टर्स के लिए इसका मतलब

इन्वेस्टर्स  के रूप में, इसलिए आप यह जांचना चाहेंगे कि ये इन्वेस्टमेंट व्यक्तिगत रूप से कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं। यदि किसी कंपनी के पास दूसरी किसी कंपनी के शेयर हैं और कंपनी कोई विशेष टेक्नोलॉजी बनाती है जो 2019 में सबसे चर्चित चीज़ा थी, लेकिन अब तेज़ी से अप्रचलित हो रही है, तो यह घाटे वाला इन्वेस्टमेंट साबित हो सकता है।

इसके उलट यदि कोई कंपनी ऑक्सीजन सिलिंडर बनाती है (जो पहले मनोरंजन से जुड़े डाइविंग उद्योग से जुड़े थे), तो अर्निंग पहले की तुलना में बेहतर हो सकती है, क्योंकि महामारी के बीच ऑक्सीजन सिलिंडर की मांग बढ़ गई है।

लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट भी आर्थिक मजबूती का संकेतक है। किसी कंपनी के लिए अपनी पूंजी को लॉन्ग टर्म के लिए बंद करने का मतलब है कि

कंपनी आमतौर पर लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट करके जोखिम उठा रही होती है, क्योंकि माना जाता है कि लॉन्ग टर्म में जोखिम ख़त्म हो जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह भी है कि अपनी अर्निंग के तरीके को डायवर्सिफाय किया है।

निष्कर्ष: लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट कंपनी की बैलेंस शीट का महत्वपूर्ण कॉम्पोनेन्ट है, और हर एसेट की तरह, वे भी लॉन्ग टर्म में कंपनी के मुनाफे में योगदान करते हैं। इन्वेस्टमेंटर्स को इस बात पर विचार करना चाहिए कि किसी कंपनी का लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट उनके लिए इन्वेस्टर्स के तौर पर कैसा है। 

 

डिस्क्लेमर: इस ब्लॉग का उद्देश्य सिर्फ जानकारी बढ़ाना है न कि किसी इन्वेस्टमेंट पर कोई सलाह/सुझाव प्रदान करना और न ही किसी भी स्टॉक को खरीदने और बेचने की सलाह देना।

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