बाय एंड नेवर सेल किस्म के इन्वेस्टर

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02 जुलाई,2021

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शेयर बाजार में मोटे तौर पर दो तरह केपार्टिसिपेंट होते हैं- लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर और ट्रेडर।

ओवरव्यू

ट्रेडर बाज़ार की स्थिति कंपनी के प्रदर्शन और मैक्रोइकॉनोमिक फैक्टर के मुताबिक़ स्टॉक और अन्य सीक्योरिटी जल्दी-जल्दी खरीदते और बेचते हैं जबकि इन्वेस्टर लॉन्ग टर्म में संपत्ति सृजन पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। 

दुनिया के सबसे सफल इन्वेस्टर्स जिनमें वॉरेन बफे भी शामिल हैं, उनहोंने बेपनाह संपत्ति बनाने के लिए लॉन्ग-टर्म और वैल्यू इन्वेस्टिंग दोनों के संयोजन का उपयोग किया है। ऐसे दिग्गज इन्वेस्टर का अनुकरण करने वालों में से,बाय एंड नेवर सेल किस्म के इन्वेस्टर का वर्ग उभरा है। ऐसे लोग अक्सर पैसिव इन्वेस्टमेंट में भरोसा करते हैं, वैल्यू ट्रेडिंग के साथ वे लम्बे समय तक पैसा इन्वेस्ट करते हैं। 

ऐसे निवेशक को मुख्य रूप से जो चीज़ परिभाषित करती है, वह है उनकी उम्मीद कि बाजार किसी भी समय लुढ़क सकता है। इस सोच को शुरूआती इन्वेस्टमेंट पर भारी-भरकम कंपाउंड इंटरेस्ट मिलने की संभावना और खास तौर पर हैंड्स-ऑफ नज़रिए से मदद मिलती है। हालाँकि, इन्वेस्टमेंट के प्रति यह दृष्टिकोण उतना सरल नहीं है जितना लगता है। 

बाय एंड होल्ड की रणनीति

बाय एंड होल्ड ऐसी रणनीति है जिसका उपयोग बड़ी संख्या में इन्वेस्टर स्टॉक या अन्य एसेट खरीदने और लंबे समय तक अपने पास रखने के लिए करते हैं। इस रणनीति के तहत बाजार के उतार-चढ़ाव से नुकसान बहुत कम होता है और ऐसे इन्वेस्टर्स पर टेक्निकल इंडिकेटर का कोई असर नहीं होता। 

बॉन्ड जैसे अन्य एसेट के बजाय इक्विटी में निवेश किए जाने पर बाय-एंड-होल्ड की रणनीति सबसे सफल रहती है। ट्रेडिंग और बाय-एंड-होल्ड दोनों की अपनी-अपनी खासियत है, बाय एंड होल्ड को टैक्स बेनिफिट ज़्यादा मिलता है क्योंकि ऐसे इन्वेस्टर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर लगने वाले टैक्स को अपनी सुविधानुसार टाल सकते हैं। 

बाय-एंड-होल्ड इन्वेस्टमेंट की एक और प्रमुख विशेषता है कि इन्वेस्टर ट्रेड को केवल जल्दी पैसा बनाने के तरीके के रूप में नहीं देखते हैं, बल्कि कंपनियों के ऑपरेशन की प्रक्रिया में भी गहरी रूचि रखते हैं। शेयरहोल्डर के पास कंपनी की ओनरशिप और वोटिंग का अधिकार होता है, इसलिए डायरेक्टरों की नियुक्ति, विलय और अधिग्रहण, और इन्वेस्टर के अधिकार जैसे मामलों में उनके पास अपनी बात रखने का आधार हो सकता है। 

लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर बनाम शॉर्ट टर्म ट्रेडर

इन्वेस्टर अक्सर पैसिव के बजाय एक्टिव इन्वेस्टिंग करते हैं या इसके उलट भी, और दोनों के अच्छे फायदे होते हैं। एक्टिव इन्वेस्टमेंट के लिए ट्रेडर को एक पोर्टफोलियो मेनेजर रखना होता है या फिर खुद ही इसकी भूमिका निभानी होती है। यह अक्सर एक होल-टाइम जॉब की तरह होता है और इन्वेस्टमेंट करने या वापस लेने के लिए विशेषज्ञता और गहरे विश्लेषण की ज़रुरत होती है। प्रोफेशनल पोर्टफोलियो मैनेजर आमतौर पर एनेलिस्ट की एक टीम का इन्चार्ज होता है जो सारे फैक्टर की स्टडी करता है - क्वालिटेटिव और क्वांटिटेटिव - यह तय करने से पहले कि इन्वेस्टर की पूंजी कहां और कैसे लगाई जाए। 

एक्टिव इन्वेस्टिंग बेहद लचीला हो सकता है, जिससे इन्वेस्टर को ऐसे स्टॉक खरीदने में मदद मिल सकती है जिनका प्रदर्शन भविष्य में बेहतर हो। इससे मेनेजर्स को पुट ऑप्शन और शॉर्ट सेल्स के ज़रिये हेजिंग करने में भी मदद मिलती है। इन्वेस्टर का अपने फिनांस पर बेहतर नियंत्रण होता है और वह उन सीक्योरिटी को छोड़ने का विकल्प चुन सकता है जिनमें मुनाफा नहीं हो रहा है, या ऐसी सीक्योरिटी खरीद सकता है जिनमें उनके हिसाब से ज़्यादा फायदा हो। 

पैसिव इन्वेस्टर या जो लम्बे समय के लिए इसमें बने रहना चाहते हैं वे अक्सर बाय एंड होल्ड की रणनीति अपनाते हैं। इस तरह की इन्वेस्टिंग की लागत कम होती है और यह ईटीएफ या म्यूचुअल फंड खरीदकर किया जा सकता है। इन्वेस्टर को अक्सर तय अवधि के लिए इन्वेस्टमेंट की राशि लॉक करनी होती है जिसका मतलब है उनके पास शॉर्ट टर्म में बाज़ार के हालात के हिसाब से खरीद-बिक्री का विकल्प नहीं होता है। जो लोग शेयर बाजार में एक्टिव ट्रेड के बारे में आश्वस्त नहीं होते हैं, या आवश्यक जानकारी की कमी होती है, लेकिन लॉन्ग टर्म में मुनाफा कमाना चाहते हैं, वे अक्सर बाय एंड नेवर सेल किस्म के इन्वेस्टर बन जाते हैं। 

बाय एंड नेवर सेल किस्म के इन्वेस्टर विरोधाभासी क्यों हैं

जब कड़ी मेहनत की कमाई या बचत दांव पर होती है तो बहुत धीरज वाले इन्वेस्टर के लिए भी बाज़ार की विपरीत परिस्थिति को झेलना मुश्किल हो सकता है। इसका मतलब यह है कि बाय एंड नेवर सेल किस्म के इन्वेस्टर को भी कभी-कभी अपना स्टॉक बेचना पड़ता है। इसकी वजह यह है। 

सारे बाय एंड नेवर सेल इन्वेस्टर पैसिव तरीके से निवेश नहीं करते। कुछ लोग बाजार को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं, और फिर भी बाय एंड नेवर सेल की रणनीति चुनते हैं। हालाँकि, इस तरह की समझ के साथ विरोधाभास का बोझ भी संग आता है। ऐसे निवेशक आमतौर पर इस धारणा के साथ काम करते हैं कि बाजार कभी भी टूट सकता है इसलिए अपने इन्वेस्टमेंट को होल्ड कर रखते हैं। हालांकि, स्टॉक की कीमत में लगातार बढ़ोतरी के कारण वे ज़्यादा मौके की तलाश में अपनी इन्वेस्टमेंट फिलॉसोफी छोड़ सकते हैं। 

खरीद कर होल्ड करने का बस यह मतलब है कि इसमें बने रहें लेकिन इससे इन्वेस्टर को काफी चिंता हो सकती है। ऐसा इसके बावजूद होता है कि कुछ भी नहीं करने का सीधा-सादा विकल्प अच्छी तरह तैयार की गई रणनीति का हिस्सा होता है जिसमें कई छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण फैसले शामिल हो सकते हैं। इसलिए, इन्वेस्टर होने का मतलब है कि ऐसा व्यक्ति जो खरीदे लेकिन कभी बेचे नहीं, मतलब उसके पास धैर्य हो। और संभावना है कि उसे मुनाफ़ा होगा। 

जब बाजार में भारी उतार-चढ़ाव होता है तो इन्वेस्टर को लग सकता है कि वे कुछ करने के लिए मजबूर हैं, लेकिन लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर को अपनी इन्वेस्टमेंट को न छूने की सलाह पर ध्यान देना चाहिए। उथल-पुथल के दौरान बेचने से इन्वेस्टर तय लॉन्ग-टर्म मुनाफा हासिल नहीं कर पायेंगे। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इन्वेस्टर को पैनिक सेलिंग से बचना चाहिए क्योंकि बाजार के सबसे बुरे दौर के बाद आमतौर पर सबसे अच्छे दौर आते हैं। 

क्यों बेचें?

लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर के पास होल्ड करने और देर से लाभ उठाने के की कई वजहें हैं लेकिन यदि उनके पास कोई ऐसी वजह कि बेचने के अलावा कोई चारा नहीं है तो उन्हें ज़रूर बेचना चाहिए। यदि इन्वेस्टर को पता चले कि इन्वेस्टमेंट गलत तथ्यों के आधार पर किया गया था या स्टॉक ओवरप्राइस्ड हो गया है, या यदि उन्हें कैश चाहिए, तो उन्हें अपने स्टॉक बेचने चाहिए, भले ही यह उनके निवेश की धारणा के खिलाफ हो। 

यदि उन्हें पता चलता है कि कंपनी का बिजनेस मॉडल लंबे समय तक काम नहीं करेगा, तो उन्हें शायद इसके शेयर बेचने के बारे में सोचना चाहिए। दरअसल, पोर्टफोलियो को पुनर्व्यवस्थित या डायवर्सिफाय करते समय उस इन्वेस्टमेंट को किसी दूसरे स्टॉक में लगाना अच्छा फैसला हो सकता है। बच्चे के जन्म, तलाक या सेवानिवृत्ति जैसी जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं के कारण इन्वेस्टर के पोर्टफोलियो में इस तरह की एडजस्टमेंट की ज़रुरत हो सकती है। 

यदि उन्हें किसी चीज़ के लिए पूंजी के रूप में इन्वेस्ट किए गए धन की ज़रुरत हो यह भी बेचने की एक और वजह हो सकती है। यह लोन लेने और कई साल तक कर्ज चुकाने से बेहतर विकल्प होगा। अंत में, यदि उस कंपनी में कुछ ऐसा हुआ है जिसमें आपने इन्वेस्ट किया हो, या कोई ऐसी खबर जो इसकी संभावनाओं के लिए हानिकारक हो सकते हैं, तो उन्हें बेचने के बारे में सोचना चाहिए।

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