कराधान से होता कल्यणिक नुक्सान

18 नवम्बर,2021

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नया टैक्स लगाने को टैक्सेशन के वेलफेयर कॉस्ट के तौर पर जाना जाता है। ये लागत टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन, कंप्लायंस, अवॉयडेंस, या इवेज़न के साथ-साथ डेडवेट लॉस (बाज़ार की अक्षमता के कारण समाज को होने वाला नुकसान) से जुड़ी होती हैं। आइए इस अवधारणा को गहराई से समझते हैं।

उपक्षेप

सुचारु नागरिक संचालन के उद्देश्य से नागरिक अपनी सरकार को कर देते हैं। कर वसूली के बिना सरकारों के लिए देश का संचालन करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। आयकर वसूली भारतीय सरकार के लिए धन संग्रह का सबसे बड़ा ज़रिया है। लेकिन अगर भारतीय नागरिक आयकर भुगतान को एक वित्तीय बोझ की तरह देखना शुरू करते है, तो वह भारतीय वित्तीय प्रणाली के लिए हानिकारक साबित हो सक्ता है। 

आयकर वसूली से कल्याणकारी योजनाएं भी चलाई जाती हैं। आज भारत में ५० से ज़्यादा कल्याणकारी योजनाएं केंद्रीय सरकार द्वारा चलाई जाती हैं, जो समाज के विविध वर्गों के कल्याण के लिए बनाई गयी हैं।

उत्तम स्वस्थ्य एवं शिक्षा सेवाओं के लिए भी कर वसूली की जाती है।

अब जब हम कर वसूली के फायदों के बारे में बात कर चुके हैं, चलिए जानते हैं इससे होते हुए कल्याणिक नुक्सानों के बारे में।

संक्षिप्त विवरण

कर वसूली के कल्याणिक नुक्सानों से हमारा मतलब है वह आर्थिक और सामाजिक नुक्सान जो किसी नए कर लागू होने पर होता है। अगर आसान शब्दों में कहें तो यह वह सामाजिक खर्च है जो खरीदने की क्षमता करदाता से लेकर नया कर लागू करने वालों को देने में लगता है।

इस तरह के कर आर्थिक रूप से उत्पादक गतिविधि से बने होते हैं जो कि छोड़े गए हैं और वास्तविक संसाधन या तो कराधान की प्रक्रिया के कारण या कर की प्रतिक्रिया में श्रमिकों, उपभोक्ताओं और व्यवसायों के क्षतिपूर्ति पैटर्न के कारण डूबे हुए हैं।

क्या है कर वसूली के कल्याणिक नुक्सान?

सरकार कर वसूली कुछ कारणों के लिए करती है, जिसमें शामिल है कुछ ज़रूरी सामाजिक आवश्यकताएं पूरी करना और सामाजिक धन का सामान वितरण होना। सामान वितरण न होने पर धन केवल कुछ अमीर एवं शक्तिशाली लोगों के पास ही जाता रहेगा। हालांकि यह जानना भी ज़रूरी है कि कर लागू करने और वसूल करने में भी खर्च आता है। इन करों का लागू करना करदाताओं को मिलने वाले आर्थिक फायदों को कम कर सक्ता है और उनके कर भरने की प्रवृति को बदल सक्ता है।

अगर इससे सार्वजनिक वित्त के नज़रिए से देखा जाए तो इन खर्चों को 'ट्रांसेक्शन कॉस्ट' माना जा सक्ता है।

ऐसे कई साड़ी लागतें है जो कर वसूली में लगने वाले खर्च को बढाती हैं। इन खर्चों में शामिल है टैक्सड मार्केट में होने वाले घातक नुक्सान, सम्बंदित बाज़ारों में होने वाले कल्यणिक नुक्सान, कर परिहार में होने वाले खर्च, व्यस्थापन लागत, कर चोरी में लगने वाले लागत और अनुपालन लागत।

इन खर्चों की भरपाई निम्नलिखित स्त्रोतों से होती है।

१. करदान की प्रक्रिया में भी कुछ संसाधनों का इस्तेमाल होता है।

२. लोग अपने आर्थिक पैटर्न को करादान के अनुसार बदलते हैं जो अवसर में लगनी वाली लागत को बढ़ाता है। ये पहले की आर्थिक रूप से उत्पादक गतिविधियों के रूप में मौजूद हैं जो अब कर के कारण हतोत्साहित हैं और गतिविधियों द्वारा वास्तविक संसाधनों की खपत को प्रोत्साहित करती हैं।

कराधान की सामाजिक लागतों के प्रकार:

कराधान में लगने वाली सामाजिक लागतों को कई प्रकारों में बांटा जा सक्ता है. हालांकि कर बाजार में होने वाला 'डेडवेट लॉस' कराधान में होने वाली सामाजिक लागतों में सबसे ज़्यादा चर्चित प्रकार है, इसे चर्चित बनाने के पीछे कई कारण हैं।

मैक्रोइकॉनॉमिक डिस्टॉरशनस और डेडवेट लॉसेस:

डेडवेट लॉसेस तब होते हैं जब किसी कमोडिटी का बाज़ारी भाव और उसकी मात्रा एक्विलिब्रियम भाव पर नहीं मिल पाते हैं। इसमें शामिल हैं लागत से सम्बंधित मात्रा और सामान के उत्पादन और खपत के उपयुक्त 'कर्व्स' में होने के फ़ायदे।

कल्याणकारी अर्थशास्त्र को देखते समय, इसकी गणना या चित्रण उस अंतर के रूप में किया जा सकता है जो उस बाजार द्वारा पूरी तरह से बनाए गए आर्थिक अधिशेष के बीच मौजूद है जिसमें कर की बढ़त या कमी है और उत्पादक अधिशेष, कर राजस्व एकत्रित और उपभोक्ता अधिशेष की राशि है।

चूंकि कर वस्तुओं के लिए खरीदारों द्वारा भुगतान की गई कीमतों और उन्ही वस्तुओं के लिए विक्रेताओं को प्राप्त हुई कीमतों के बीच अंतर पैदा करते हैं, इसलिए किसी भी कर में एक 'डेडवेट लॉस' होता है। डेडवेट लॉस को कर की दर के समरूपता में वृद्धि के कारण जाना जाता है।

अनुपालन लागत :

इन लागतों को प्रशासनिक लागतों से जोड़ा जाता है क्योंकि वे कर से जुड़ी प्रशासनिक लागत को संदर्भित करते हैं जो अब उन पर लागू होती है जिन पर कर लगाया जाता है। इन लागतों में लेखांकन रिकॉर्ड, टैक्स रिटर्न या फॉर्म के उत्पादन और भंडारण से जुड़ी लागतें शामिल हैं। एजेंसी से जुडी लागत भी इसमें शामिल हो सकती है।

परिहार लागत:

करदाता के कर बोझ को कम करने के लिए होने वाले लेनदेन से जुड़ी लागत और अवसर मिलने से जुडी लागत इस श्रेणी के अंतर्गत आती है।सरल शब्दों में कहा जाए तो, कानूनी रूप से अपने कर बोझ को कम करने के लिए किसी भी व्यक्ति की स्वैच्छिक कार्रवाई से जुड़ी लागत परिहार लागत के अंतर्गत आएगी।

कर चोरी में लगने वाल लागत :

परिहार लागत की तरह, इसमें शामिल है कर से बचने के लिए की गयी गतिविधियों में आने वाली लागत। इसमें उन गतिविधियों की लागत भी शामिल है जिनमें करदाता अवैध रूप से करों से बचने पर पता लगाने से बचने के लिए संलग्न हो सकते हैं।

निष्कर्ष:

आयकर, जो भारत में सबसे अधिक मान्यता प्राप्त कर है, वर्तमान में आज केवल एक प्रतिशत भारतीयों द्वारा भुगतान किया जाता है। हालांकि कर जनता के लिए आर्थिक रूप से तनावपूर्ण होते हैं, वे जनता को अधिक से अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की अनुमति देते हैं और इनका भुगतान ज़रूर किया जाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल:

प्रश्न  1 कितने प्रतिशद भारतीय आयकर का भुगतान करते हैं?
उत्तर1. केवल १ प्रतिशद भारतीय आयकर का भुगतान करते हैं।

प्रश्न २ 'कराधान का कल्यणिक नुक्सान' का क्या अर्थ होता है?
उत्तर2 कराधान का कल्याणिक नुकसान एक नए कर को लागू करने के कारण आर्थिक और सामाजिक कल्याण में गिरावट को दर्शाता है।

प्रश्न.3 कराधान की कुछ सामाजिक लागतों के नाम बताएं।
उत्तर3 कराधान की सामाजिक लागतों में शामिल है कर चोरी की लागत, परिहार लागत, अनुपालन लागत और सूक्ष्म आर्थिक विकृतियां, जिनमें से एक है 'डेडवेट लॉसेस'।

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