डबल टैक्सेशन क्या है?

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12 जनवरी,2022

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कॉर्पोरेशन अलग-अलग तरह के नियमों का पालन करते हैं और अलग-अलग तरह के बिज़नेस के मुकाबले अलग-अलग कर्तव्य होते हैं। और चाहे आप बिज़नेस चलाते हों या स्टेकहोल्डर हों, आपको डबल टैक्सेशन के कॉन्सेप्ट के बारे में जानकारी होनी चाहिए। कंपनी व्यवस्था के अन्य रूपों के विपरीत कॉर्पोरेशन पर दो बार कर लगाया जाता है। डबल टैक्सेशन का मतलब जानने के लिए पढ़ना जारी रखें!

ऐसी स्थिति जिसमें किसी इन्कम पर दो बार कर लगाया जाता है, डबल टैक्सेशन के रूप में जाना जाता है। यह दो में से एक तरीके से हो सकता है: आर्थिक या कानूनी रूप से। जब किसी इन्कम या उसके एक हिस्से पर एक ही देश में दो अलग-अलग लोगों द्वारा टैक्स लगाया जाता है, तो इसे इकॉनोमिक डबल टैक्सेशन के रूप में जाना जाता है। लीगल डबल टैक्सेशन की स्थिति तब आती है जब भारत से बाहर अर्जित धन पर दो बार टैक्स लगाया जाता है, एक बार विदेश में और फिर अपने देश में। जब किसी टैक्सपेयर की इन्कम पर दो बार टैक्स लगाया जाता है, तो इस असामान्य स्थिति में उन पर बहुत बोझ पड़ता है।

हम डबल टैक्सेशन को कैसे रोक सकते हैं?

जबकि कोई असेसी डबल टैक्सेशन से बच नहीं सकता है, इन्कम टैक्स एक्ट उन लोगों को कुछ रिलीफ देता है जिनकी कमाई पर दो बार टैक्स लगने की संभावना होती है। इस रिलीफ मेथड का आधार है डबल टैक्सेशन अवॉयडेंस एग्रीमेंट।

डीटीएए दरअसल क्या है?

भारत और दूसरे देश के बीच की टैक्स ट्रीटी को डबल टैक्सेशन अवॉयडेंस एग्रीमेंट के रूप में जाना जाता है। कोई भी व्यक्ति इस संधि की ज़रूरतों का पालन कर दो बार टैक्स लगाए जाने से बच सकता है। डीटीएए या तो कॉम्प्रीहेंसिव एग्रीमेंट हो सकते हैं जिनमें इन्कम के सभी स्रोत शामिल होते हैं या विशिष्ट ट्रीटी हो सकती हैं जो विशिष्ट समूह पर केंद्रित होती हैं।

उदाहरण के लिए, भारत और सिंगापुर के बीच डीटीएए है जिसके तहत व्यक्ति के रेजिडेंस स्टेटस के आधार पर उसे इन्कम पर टैक्स लगाया जाता है। यह टैक्स प्रक्रिया को सरल बनाता है और गारंटी देता है कि भारत के बाहर किसी व्यक्ति की इन्कम पर दो बार टैक्स नहीं लगाया जाता है। भारत का अब 80 से अधिक देशों के साथ डीटीएए है।

डबल टैक्सेशन की कार्यप्रणाली

कॉर्पोरेशन पर कमर्शियल एंटिटी के तौर पर टैक्स लगाया जाता है, और हर शेयरहोल्डर्स की व्यक्तिगत इन्कम पर भी टैक्स लगाया जाता है। डबल टैक्सेशन प्रावधान इसलिए किया जाता है कि कंपनियों और उनके शेयरहोल्डर्स को अलग-अलग कानूनी संस्थाएं माना जाता है।

कंपनियों के लिए अपने सालाना प्रॉफिट पर टैक्स का भुगतान करना ज़रूरी है। जब कंपनियां अपने शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड का भुगतान करती हैं तो उन पर टैक्स लग सकता है। शेयरहोल्डर्स को मिले किसी भी डिविडेंड पर टैक्स लगाया जाना चाहिए। इसी वजह से डबल टैक्स का प्रावधान है। कॉर्पोरेशन जब तक कंपनी का प्रॉफिट(रिटेन्ड अर्निंग) शेयरहोल्डर्स से बीच डिविडेंड के तौर पर नहीं बांटतीं तब तक टैक्स नहीं देतीं।

इन्कम टैक्स एक्ट डबल टैक्सेशन से कैसे रिलीफ देता है?

  • यूनिलैटरल या बायलैटरल रिलीफ

यूनिलैटरल रिलीफ: इन्कम टैक्स एक्ट,1961 की धारा 91 के तरह अलग-अलग मामलों के आधार पर डबल टैक्स से एग्ज़ेम्प्शन की सुविधा है। भले ही भारत और अन्य सम्बद्ध देश के बीच डीटीएए हो, किसी व्यक्ति को इस खंड की शर्तों के तहत सरकार से दो बार टैक्स से एग्ज़ेम्प्शन मिल सकती है। हालांकि, किसी व्यक्ति को यूनिलैटरल रिलीफ के योग्य होने के लिए कुछ अनिवार्यताएं पूरी करना ज़रूरी है। इन शर्तों में शामिल हैं:

  • पिछले साल, व्यक्ति या बिज़नेस का निवास स्थान भारत हो।
  • पिछले साल टैक्सपेयर को धनअर्जित हुआ हो और यह भारत के बाहर से हुआ हो।
  • भारत और उन देशों जिनके साथ कोई डीटीएए नहीं है, में इन्कम पर टैक्स लगाया गया हो।
  • उस देश में व्यक्ति या कंपनी ने टैक्स दिया हो।
  • हर तरफ से रिलीफ

इन्कम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 90 में बायलैटरल रिलीफ शामिल है। इसमें एक डीटीएए है जो इसे डबल टैक्सेशन से बचाता है। इस तरह की सहायता दो तरह से दी जाती है।

  • एग्ज़ेम्प्शन का तरीका

एग्ज़ेम्प्शन की अप्रोच डबल टैक्सेशन से व्यापक सुरक्षा प्रदान करती है। अर्थात्, यदि भारत के बाहर पैदा धन पर किसी अन्य देश में टैक्स लगाया गया है, तो भारत में उस पर टैक्स नहीं लगाया जाता है।

  • टैक्स क्रेडिट का दावा करने का मेथड

कोई व्यक्ति या कॉर्पोरेशन इस अप्रोच का उपयोग करके भारत के बाहर भुगतान किए गए टैक्स के लिए टैक्स क्रेडिट (डीडक्शन) का दावा कर सकता है। इस टैक्स क्रेडिट का उपयोग भारत में बकाया टैक्स की भरपाई के लिए किया जा सकता है, जिससे असेसी के कुल कर बोझ को कम किया जा सकता है।

उदाहरण

राहुल किसी कंपनी के इकलौते मालिक और सीईओ हैं। पहले साल में कंपनी को 100,000 रुपये का प्रॉफिट हुआ। परिणामस्वरूप, साल के अंत में इसका रीटेंड प्रॉफिट अकाउंट 100,000 रूपये का है। पहले साल कंपनी ने 20 प्रतिशत इन्कम टैक्स यानि 20,000 रुपये के टैक्स का भुगतान किया।

राहुल उस साल डिविडेंड के तौर पर खुद 100,000 रुपये का रीटेंड प्रॉफिट देने का विकल्प चुनते हैं। नतीजतन, उन्हें अपने पर्सनल टैक्स रिटर्न पर डिविडेंड इन्कम में 100,000 रुपये दर्ज़ करना होगा और उस पर 15 प्रतिशत टैक्स का भुगतान करना होगा। जैसा कि आप देख सकते हैं, उस कंपनी की इन्कम पर दो बार टैक्स लगाया गया: पहला 20 प्रतिशत कॉर्पोरेट स्तर पर और फिर 15 प्रतिशत व्यक्तिगत स्तर पर।

मान लीजिए कि राहुल अपनी कंपनी को किसी दूसरे देश में स्थानांतरित करने का विकल्प चुनते हैं। नए देश में उनके प्रॉफिट पर उस देश के टैक्स सिस्टम के अनुसार टैक्स लगाया जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें अमेरिकी इन्कम टैक्स के भुगतान से छूट नहीं मिलती। विदेशी टैक्स के अलावा उन्हें अब भी अमेरिकी इन्कम टैक्स का भुगतान करना होगा। ऐसा आम तौर पर होता है कि कोई व्यक्ति किसी देश में काम करता है और दूसरे देश में अपने परिवार को धन हस्तांतरित करता है। इस पैसे पर अक्सर उसके मूल देश में इन्कम टैक्स लगता है।

निष्कर्ष

जिन्हें अन्य देशों से इन्कम हासिल होती है वे अपनी टैक्स लायबिलिटी कम कर सकते हैं और डीटीएए के प्रावधानों और इन्कम टैक्स एक्ट द्वारा प्रदान किए गए रिलीफ के उपाय का उपयोग कर डबल टैक्सेशन से बच सकते हैं।

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