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मुद्राओं और जिंसों का परिचय

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15 प्रमुख नियम हर व्यापारी को जानना चाहिए

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मुद्रा बाज़ार में व्यापार कैसे होता है और आप मुद्रा का कारोबार कैसे कर सकते हैं, इसके बारे में जानने के लिए पहले इनके ट्रेड से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण शब्दों से परिचित होना ज़रूरी है। तो चलिए सीधे पॉइंट पर आते हैं मुद्रा की मूल बातों से  शुरुआत करते हैं।

1. मुद्रा जोड़ी

विदेशी मुद्रा बाज़ार में आप सिर्फ एक मुद्रा न तो खरीद सकते हैं और न तो बेच सकते हैं। मुद्रा में व्यापार करते समय यह ध्यान रखने वाली सबसे बुनियादी चीज़ों में से एक है। मुद्राओं को हमेशा जोड़े में ट्रेड किया जाता है। और ज़ाहिर तौर पर, ऐसे हर सेट को मुद्रा जोड़ी कहा जाता है। मुद्रा जोड़ी का एक उदाहरण USD-INR जोड़ी है। जब आप USD-INR जोड़ी खरीदते हैं  तो आप मूल रूप से डॉलर खरीद रहे हैं और रुपया बेच रहे हैं।

आप जब भी मुद्रा बाज़ार में व्यापार करते हैं, तो आप मुद्रा जोड़ी खरीदते या बेचते हैं। और प्रत्येक जोड़ी में दो मुद्राएं हैं,एक बेस करेंसी और एक कोट करेंसी।

2. आधार मुद्रा/ बेस करेंसी

आधार मुद्रा वह पहली मुद्रा है जिसका उल्लेख मुद्रा जोड़े में होता है। उदाहरण के लिए EUR-USD मुद्रा जोड़ी में आधार मुद्रा यूरो है।

3. भाव मुद्रा/ कोट करेंसी

कोट करेंसी एक मुद्रा जोड़ी में दूसरी मुद्रा है। उदाहरण के लिए  EUR-USD मुद्रा जोड़ी में कोट करेंसी USD है।

4. विनिमय दर/ एक्सचेंज रेट

विनिमय दर वह दर है जिस पर एक मुद्रा का दूसरी मुद्रा के लिए लेन-देन किया जाता है। तो यह किसी एक मुद्रा का मूल्य किसी दूसरी मुद्रा में व्यक्त किया गया मूल्य है।  उदाहरण के लिए अगर (USD-INR) जोड़ी 75.19 है, तो इसका मतलब है कि 1 USD की कीमत ₹75.19 है।

जब किसी मुद्रा जोड़ी का एक्सचेंज रेट बढ़ता है तो वह यह दर्शाता करता है कि आधार मुद्रा का मूल्य,  कोट मुद्रा के मुकाबले बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि कोट मुद्रा का मूल्य, आधार मुद्रा की तुलना में गिर रहा है। और इसके विपरीत जब एक्सचेंज रेट कम होता है तो इसका मतलब है कि आधार मुद्रा का मूल्य, कोट मुद्रा के मुकाबले गिर रहा है, और कोट मुद्रा, आधार मुद्रा के मुकाबले मज़बूत हो रही है। 

उदाहरण के तौर पर, मानिए कि आज USD-INR के लिए विनिमय दर 75.19 है और कल यह 76 तक बढ़ जाती है। इसका मतलब है कि आज आप 1 अमेरिकी डॉलर ₹75.19 में  खरीद सकते हैं। लेकिन कल  उसी 1 डॉलर के लिए आपको ₹76 का भुगतान करना होगा। इसलिए USD का मूल्य बढ़ा है और INR का मूल्य कम हो गया है।

5. क्रॉस रेट

एक विनिमय दर जिसमें कोट के लिए उस देश की आधिकारिक मुद्रा ना शामिल होती और ना उपयोग की जाती है उसे क्रॉस रेट के रूप में जाना जाता है। आइए एक उदाहरण देखते हैं जहां आप भारत में मुद्रा व्यापार कर रहे हैं। मान लें कि आप अपना दैनिक अखबार खोलते हैं और निम्नलिखित दर देखते हैं: 

  1. GBP-EUR: 1.12
  2. GBP-JPY: 134.48
  3. EUR-JPY: 120.52
  4. USD-INR: 75.24
  5. GBP-INR: 94.78

यहां  1 से 3 तक की एंट्री सभी क्रॉस रेट हैं क्योंकि वे INR  का उल्लेख नहीं करते हैं। लेकिन एंट्री 4 और 5 क्रॉस रेट नहीं हैं  क्योंकि वे भारत की आधिकारिक मुद्रा से संबंधित हैं। इसी तरह अमेरिका में EUR-JPY  या GBP-EUR विनिमय दरों को क्रॉस रेट के रूप में माना जाएगा।

6. पिप

मुद्रा में व्यापार के लिए यह एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द है। तकनीकी रूप से पिप, पर्सेंटेज इन पॉइंट की शॉर्ट फॉर्म है। यह किसी भी विदेशी मुद्रा के मूल्य की सबसे छोटी इकाई है और यह आम तौर पर उन अंकों को संदर्भित करता है जो रेट के चौथे दशमलव स्थान से जोड़े या घटाए जाते हैं। उदाहरण के लिए GBP-USD जोड़ी के लिए 1 पिप 0.0001 के बराबर है। तो यह जोड़ी वर्तमान में 1.26433 पर कारोबार कर रही है और  इसके बाद वह मूल्य 1.26443 हो जाता है। इसका मतलब है कि यह मूल्य 1 पिप से बढ़ा है। 

हालांकि अधिकांश येन जोड़ी में पिप दूसरे दशमलव स्थान पर होता है। तो USD-JPY जोड़ी के लिए 1 पिप 0.01 होगा।

7. पिपेट

एक पिपेट एक पिप का दसवां हिस्सा है। दूसरे शब्दों में,  यह मुद्रा जोड़ी की विनिमय दर में पांचवां दशमलव स्थान है (येन जोड़े को छोड़कर जिस स्थिति में यह तीसरा दशमलव स्थान है)।

 

8. बिड प्राइस

बि़ड प्राइस वह मूल्य है जिसपर बाज़ार किसी एसेट को खरीदने के लिए तैयार है। मुद्रा बाज़ारों के मामले में यह वह मूल्य है जिस पर आप एक मुद्रा जोड़ी में आधार मुद्रा को बेच सकते हैं। 

9. आस्क प्राइस

यह वह मूल्य है जिसपर बाज़ार एक एसेट को बेचने के लिए तैयार है। मुद्रा बाज़ारों के मामले में यह वह मूल्य है जिस पर आप एक जोड़ी में आधार मुद्रा को खरीद सकते हैं। 

बिड और आस्क प्राइस आमतौर पर एक साथ दर्शाए जाते हैं, जैसे:

USD-INR: 76.3475 / 76.3775

इसका मतलब यह है कि बाज़ार में एक खरीदार, एक USD के लिए ₹76.3475 का उच्चतम मूल्य चुकाने को तैयार है। लेकिन ₹76.3775 वो निम्नतम कीमत है पर जिसपर एक विक्रेता, USD को बेचने के लिए तैयार है।

10. स्प्रेड

बिड प्राइस और आस्क प्राइस के बीच के अंतर को स्प्रेड कहा जाता है। जब आप मुद्रा में व्यापार करते हैं  तो स्प्रेड एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। ऊपर दिए गए उदाहरण में स्प्रेड 0.30 हो जाता है।

11. लॉन्ग और शॉर्ट पोज़ीशन 

जब आप मुद्रा का व्यापार करना सीख रहे हैं तो यह एक महत्वपूर्ण कॉन्सेप्ट है। एक लॉन्ग पोज़ीशन लेने का मतलब है कि आप एक मुद्रा इसलिए खरीदते हैं, क्योंकि आप भविष्य में इसकी कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद करते हैं। इसे गोइंग लॉन्ग भी कहा जाता है।  दूसरी ओर, एक शॉर्ट पोज़ीशन का मतलब यह है कि आप आज एक मुद्रा बेच रहे हैं  क्योंकि आपको भविष्य में इसकी कीमतें गिरने की आशंका है। तो आप अपनी पोज़ीशन को स्क्वेयर ऑफ करके, बाद में कम कीमत पर मुद्रा वापिस खरीद सकते हैं। 

12. लॉट

डेरिवेटिव की तरह  मुद्राओं का भी कारोबार लॉट में किया जाता है। विदेशी मुद्रा बाज़ार में एक स्टेंडर्ड लॉट 1,00,000 यूनिट है। हालांकि अन्य विकल्प भी उपलब्ध हैं,  जैसे मिनी लॉट (10,000 यूनिट), माइक्रो लॉट (1,000 यूनिट) और नैनो लॉट (100 यूनिट)। 

13. टिक साइज

टिक साइज मुद्रा जोड़ी की कीमत की चाल में हुआ सबसे छोटा बदलाव  है। टिक साइज जानने से आपको सही ट्रेडिंग पोज़ीशन लेने में मदद मिलती है। जब आप एक मुद्रा जोड़ी के टिक साइज और कॉन्ट्रैक्ट साइज जानते हैं तो आप जानते हैं कि किसी समय पर कीमत कितनी बढ़ सकती है। 

14. अंतिम निपटान दिन/ फाइनल सेटलमेंट डे

यह शब्द उस ट्रेड दिन को संदर्भित करता है जब आपका करेंसी डेरिवेटिव एक्सपायर होता है। याद है शेयर वायदा और विकल्पों के लिए  एक्सपायरी आमतौर पर हर महीने के अंतिम गुरुवार को होती है? उसी तरह, भारत में मुद्रा कारोबार के लिए, करेंसी डेरिवेटिव्स का सेटलमेंट डे आमतौर पर महीने का अंतिम कार्य दिवस होता है।

15. सेटलमेंट प्राइस/ निपटान मूल्य

यह शब्द उस मूल्य को दर्शाता है जो निपटान पर आपके मुनाफे या नुकसान को निर्धारित करता है। आमतौर पर RBI  रेफेरेंस रेट को सेटलमेंट प्राइस के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

अगर आपने एक लॉन्ग पोज़ीशन ली है, तो कॉन्ट्रैक्ट प्राइस के सेटलमेंट प्राइस से कम होने पर आपको मुनाफ़ा होगा। इसके विपरीत, अगर आपने एक शॉर्ट पोज़ीशन ली है, तो जब सेटलमेंट प्राइस, कॉन्ट्रैक्ट प्राइस से कम होता है, तब तो आपको मुनाफ़ा होता है।

निष्कर्ष

इससे आपको मुद्रा बाज़ारों में आगे बढ़ने से पहले महत्वपूर्ण चीजों के बारे में जानकरी मिल गई होगी तो अब आपको मुद्रा व्यापार करने के तरीकों के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। अगले अध्यायों में हम देखेंगे कि विनिमय दरों को कौन-कौन से कारक प्रभावित करते हैं और मुद्रा व्यापार को प्रभावित करने वाली कुछ वार्षिक घटनाओं को भी जानेंगे।

अब तक आपने पढ़ा

  • विदेशी मुद्रा बाज़ार में आप सिर्फ एक मुद्रा न तो खरीद सकते हैं और न बेच सकते हैं। मुद्राओं का कारोबार हमेशा जोड़े में किया जाता है।
  • आधार मुद्रा वह पहली मुद्रा है जिसका उल्लेख मुद्रा जोड़े में होता है।
  • कोट मुद्रा एक मुद्रा जोड़ी में दूसरी मुद्रा है।
  • विनिमय दर वह दर है जिस पर एक मुद्रा का दूसरी मुद्रा के लिए लेन-देन किया जाता है। 
  • जब किसी मुद्रा जोड़ी का एक्सचेंज रेट बढ़ता है तो वह यह दर्शाता करता है कि आधार मुद्रा का मूल्य,  कोट मुद्रा के मुकाबले बढ़ गया  है। इसका मतलब है कि कोट मुद्रा का मूल्य, आधार मुद्रा की तुलना में गिर गया है। 
  • जब एक्सचेंज रेट कम होता है तो इसका मतलब है कि आधार मुद्रा का मूल्य, कोट मुद्रा के मुकाबले गिर रहा है, और कोट मुद्रा आधार मुद्रा के मुकाबले बढ़ रही है। 
  • एक विनिमय दर जिसमें कोट के लिए उस देश की आधिकारिक मुद्रा ना शामिल होती और ना उपयोग की जाती है उसे क्रॉस रेट के रूप में जाना जाता है। 
  • एक पिप किसी भी विदेशी मुद्रा के मूल्य की सबसे छोटी इकाई है, और यह आम तौर पर उन अंकों को संदर्भित करता है जो दर के चौथे दशमलव स्थान से जोड़े या घटाए जाते हैं।
  • एक पिपेट एक पिप का दसवां हिस्सा है।
  • बिड प्राइस वह मूल्य है जो बाज़ार एक एसेट के लिए भुगतान करने को तैयार है।
  • आस्क प्राइस  वह मूल्य है जिसपर बाज़ार एक एसेट को बेचने के लिए तैयार है।
  • बिड प्राइस और आस्क प्राइस के बीच के अंतर को स्प्रेड कहा जाता है।
  • एक लॉन्ग पोज़ीशन लेने का मतलब है कि आप एक मुद्रा खरीदते हैं क्योंकि आप भविष्य में इसकी कीमतें बढ़ने की उम्मीद करते हैं।
  • दूसरी ओर एक शॉर्ट पोज़ीशन लेने का  मतलब है कि आप आज एक मुद्रा बेचते हैं क्योंकि आपको भविष्य में कीमतें गिरने की उम्मीद है।
  • टिक साइज मुद्रा जोड़ी की कीमत में होने वाले बदलाव की न्यूनतम राशि को संदर्भित करता है।
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