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भारत में कराधान: भारत में कर संरचना और विनियम

4.2

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अगर आप वेतनभोगी हैं (या स्वरोज़गार हैं), तो आप शायद हर साल अपने कर का भुगतान तब करते हैं जब इसका समय होता है। शायद आपके पास एक दोस्त है जो कराधान और फाइनेंस से अच्छी तरह  वाक़िफ़ है, और वह आपके लिए टैक्स की गणना करते हैं। या शायद, आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो कराधान के क्षेत्र में काम करता है, और वे अच्छी तरह आपके करों का ध्यान रखते हैं।

लेकिन व्यक्तिगत रूप से आप उन करों के बारे में कितना जानते हैं जिनका आप भुगतान कर रहे हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि आप उन करों का भुगतान क्यों करते हैं? या कानूनी तौर पर उस देयता को कम करने का कोई तरीका है? अगर सोचा है, तो इन सभी संदेहों को हल करने का सबसे अच्छा तरीका भारतीय कर प्रणाली को समझना है। भारत में कर, विशेषकर आयकर, काफी पेचीदा और जटिल है।

फिर भी, आम आदमी के लिए भारत में कराधान प्रणाली के सभी पहलुओं को जानना उतना ज़रूरी नहीं है। हां, सब कुछ जानना बोनस ज़रूर हो सकता है। लेकिन पहले यह जानना उचित होगा कि आपकी व्यक्तिगत आय पर टैक्स कैसे लगाया जा रहा है। और आप अपने निवेश और फाइनेंस का प्लान कैसे बना सकते हैं जिससे आप भारतीय कर प्रणाली में मौजूद टैक्स बेनेफिट का पूरा फायदा उठा सकें। भारत में कर योजना आयकर अधिनियम द्वारा शासित है, जिसमें कुल 23 अध्याय और 298 खंड हैं।

आइए व्यक्तिगत आयकर के संबंध में भारत की कराधान प्रणाली के नियमों, विनियमों और संरचना की बुनियादी बातों को समझें। 

वित्तीय वर्ष और निर्धारण वर्ष की अवधारणा

यह सबसे बुनियादी चीज़ों में से एक है जिसे हम टैक्स की गणना को समझने से पहले जानेंगे।  भारत में हर साल, 12 महीने की अवधि, यानी किसी भी वर्ष के 1 अप्रैल से अगले वर्ष के 31 मार्च तक, में कमाई आय पर कर लगाया जाता है। इस अवधि को वित्तीय वर्ष या प्रीवियस ईयर के रूप में जाना जाता है। उदाहरण के लिए, 1 अप्रैल, 2019 से 31 मार्च, 2020 तक अर्जित आय को लें, यह वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए आपकी आय मानी जाती है।

वित्तीय वर्ष के अगले साल को निर्धारण वर्ष या असेसमेंट इयर कहा जाता है। यह वह वर्ष है जिसमें वित्तीय वर्ष की आय का आकलन किया जाता है। इसलिए, उपरोक्त उदाहरण में निर्धारण वर्ष 1 अप्रैल, 2020 से 31 मार्च, 2021 तक होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो असेसमेंट इयर 2020-21 होगा।

भारत में आयकर देने के लिए कौन उत्तरदायी है?

आयकर एक लायाबिलिटी है जो विभिन्न प्रकार के संगठनों के लिए समान है। व्यक्तियों, HUF, पार्टनरशिप फर्म और कंपनियों, सभी को इस कर का भुगतान करने की आवश्यकता होती है। इस अध्याय में हम विशेष रूप से आप जैसे व्यक्तियों के संबंध में  भारत की कराधान की प्रणाली पर नज़र डालेंगे और देखेगें की आप पर कर कैसे लगाया जाता है।

हमारे देश में आपके करों की देयता का निर्धारण करने में आपकी आवासीय स्थिति एक प्रमुख भूमिका निभाती है। आप पर कौन-सी शर्तों  लागू होती हैं, इसके आधार पर आपको निम्न में से किसी एक श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • रेसिडेंट और ऑर्डिनेरिली रेसिडेंट (ROR)
  • रेसिडेंट और नॉट ऑडिनेरिली रेसिडेंट (RNOR)
  • नॉन- रेसिडेंट

इन सभी श्रेणियों से संबंधित लोगों को भारत में अर्जित आय पर कर का भुगतान करना आवश्यक है। आमतौर पर, अगर आप भारत में वर्षों से रह रहे हैं और काम कर रहे हैं, तो आप एक निवासी हो जाते हैं। हम इस धारणा के तहत काम करेंगे कि आप एक निवासी भारतीय हैं और यह देखें कि निवासियों के लिए करों की गणना कैसे की जाती है।

आय के पाँच प्रमुख साधन 

हर निवासी भारतीय अपनी आय पर कर का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है। आप ब्याज की आय पर गुज़ारा कर रहे रिटायर्ड व्यक्ति हो सकते हैं, आप एक वेतनभोगी कर्मचारी हो सकते हैं, या आपने लॉटरी जीती हो, ये सभी आय भारतीय कर प्रणाली में कर योग्य हैं। विशेष रूप से, आय के पांच प्रमुख प्रकार हैं:

  1. वेतन से आय
  2. गृह संपत्ति से आय
  3. व्यवसाय या पेशे से मुनाफ़ा और आमदनी 
  4. पूंजीगत लाभ
  5. अन्य स्रोतों से आय

वेतन से आय

इस आय के स्रोत में आपके वेतन के रूप में प्राप्त होने वाली सभी कमाई शामिल है। आपका मूल वेतन, ग्रेच्युटी, पेंशन, एन्युटी, कमीशन, शुल्क, छुट्टियों का नकदीकरण, और आपके नियोक्ता से प्राप्त होने वाला लाभ, सभी इस आय के दायरे में आते हैं। इसमें आपको दिए जाने वाले भत्ते भी शामिल हैं। हालांकि कुछ भत्ते आंशिक रूप से या पूरी तरह से कर मुक्त हैं। 

गृह संपत्ति से आय

जैसा कि नाम से ही पता चलता है, इस तरह की आय में, किसी भी घर की संपत्ति से प्राप्त होने वाली कमाई शामिल है। उदाहरण के लिए, किराये की आय को इस आय वर्ग के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाता है।

व्यवसाय या पेशे से मुनाफ़ा और आमदनी 

यह आय का तीसरा प्रमुख प्रकार है, और इसमें किसी व्यक्ति के व्यवसाय या पेशे से प्राप्त मुनाफ़ा और आमदनी शामिल होती हैं। मुनाफ़ा , जो खर्च और अर्जित आय के बीच का अंतर है, इसपर टैक्स देना होता है।

पूंजीगत लाभ 

आपके नाम पर मौजूद पूंजीगत संपत्ति को बेचकर या ट्रांसफर करके आप जो मुनाफ़ा  कमाते हैं, वह पूंजीगत लाभ के रूप में कर योग्य है। उदाहरण के लिए, संपत्ति, स्टॉक, म्यूचुअल फंड और अन्य पूंजीगत एसेट में आपके निवेश से होने वाले मुनाफ़े को पूंजीगत लाभ माना जाता है। वे छोटी अवधि के पूंजीगत लाभ या लंबी अवधि पूंजीगत लाभ हो सकते हैं, और उनके अनुसार कर लगाया जाता है। 

अन्य स्रोतों से आय

किसी भी प्रकार की आय जो बताई गई श्रेणियों के अंतर्गत नहीं आती है, उसे अन्य स्रोतों से आय के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। कुछ उदाहरणों में हॉर्स रेसिंग या लॉटरी, डिविडेंड आय और सरकारी बॉन्ड और सिक्योरिटीज़ के ब्याज से होने वाली आय शामिल हैं।

कुल आय

इन सभी पाँच चीजों के अंतर्गत आय के योग को वित्तीय वर्ष की कुल आय के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

कुल आय से कटौती/ डिडक्शन

अपनी कुल आय पर टैक्स की गणना करने से पहले, आप उस आंकड़े से कुछ कटौती कर सकते हैं। ये कटौती कई और विविध हैं। आमतौर पर, व्यक्तिगत करदाताओं के लिए अधिनियम की धारा 80 C के तहत ये कटौती सबसे अधिक अहम हैं: 

धारा 80C के तहत कटौती के रूप में निम्नलिखि चीज़ों को शामिल किया गया है:

  • सार्वजनिक भविष्य निधि (PPF) में निवेश
  • कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) में निवेश
  • राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र (NSC) में निवेश
  • सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) में निवेश
  • 5 साल के टैक्स सेविंग फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश
  • वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS) में निवेश
  • जीवन बीमा में निवेश
  • इनफ्रास्टक्चर बॉन्ड में निवेश
  • यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (ULIP) में निवेश
  • इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ELSS) में निवेश
  • राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) में निवेश
  • आवास ऋण के मूलधन का पुनर्भुगतान
  • बच्चों के लिए ट्यूशन फीस का भुगतान

धारा 80 के अन्य उपखंडों के तहत कई अन्य कटौती भी उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ ये हैं:

  • धारा 80 TTA के अनुसार, बचत खाते के ब्याज के लिए कटौती 
  • धारा 80 GG के अनुसार, मकान किराए के भुगतान के लिए कटौती
  • धारा 80 E के अनुसार, शिक्षा ऋण के ब्याज के लिए कटौती
  • धारा 80 EE के अनुसार, होम लोन के ब्याज के लिए कटौती
  • धारा 80 D के अनुसार, मेडिकल बीमा के  प्रीमियम के लिए कटौती
  • धारा 80 G के अनुसार, कुछ विशिष्ट डोनेशन के लिए कटौती
 

कुल कर योग्य आय

एक बार जब आप कुल आय से सभी योग्य रकम काट लेते हैं, तो आप कुल कर योग्य आय निकालते हैं। फिर आपको उस स्लैब को देखना होगा, जिसके अंतर्गत आपकी आय आती है,और उसके अनुसार कर की गणना करनी होगी।

टैक्स स्लैब का उपयोग करके आयकर की गणना

प्रत्येक वर्ष की बजट घोषणा के दौरान आयकर स्लैब को अक्सर संशोधित किया जाता है। वर्तमान में वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए आकलनकर्ताओं के पास पुरानी योजना या नई योजना में से चुनने का विकल्प होता है। 60 साल से कम उम्र के निवासी भारतीयों के लिए इन दो योजनाओं के तहत  आयकर की दरें नीचे दी गई हैं।

कर योग्य आय

कर दर

(मौजूदा योजना)

कर दर

(नई योजना)

₹2,50,000 तक

कुछ नहीं

कुछ नहीं

₹2,50,001 से ₹5,00,000 

5%

5%

₹5,00,001 से ₹7,50,000

20%

10%

₹7,50,001 से ₹10,00,000 

20%

15%

₹10,00,001 से ₹12,50,000 

30%

20%

₹12,50,001 से ₹15,00,000 

30%

25%

₹15,00,000 से अधिक

30%

30%

60 और 80 वर्ष की आयु के बीच के वरिष्ठ नागरिकों के लिए नीचे दी गई  टैक्स दरों को लागू किया जाता हैं।

कर योग्य आय

कर दर

(मौजूदा योजना)

कर दर

(नई योजना)

₹2,50,000 तक

कुछ नहीं

कुछ नहीं

₹2,50,001 से ₹3,00,000 

कुछ नहीं

5%

₹3,00,001 से ₹5,00,000 

5%

5%

₹5,00,001 से ₹7,50,000 

20%

10%

₹7,50,001 से ₹10,00,000 

20%

15%

₹10,00,001 से ₹12,50,000 

30%

20%

₹12,50,001 ₹15,00,000 

30%

25%

₹15,00,000 से अधिक

30%

30%

अति वरिष्ठ नागरिकों, जिनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक है, को टैक्स में और भी छूट मिलती है। उनके लिए उपयोग की जाने वाली दरें नीचे दी गई हैं:

कर योग्य आय

कर दर

(मौजूदा योजना)

कर दर

(नई योजना)

₹2,50,000 तक

कुछ नहीं

कुछ नहीं

₹2,50,001 से ₹5,00,000 

कुछ नहीं

5%

₹5,00,001 से ₹7,50,000 

20%

10%

₹7,50,001 से ₹10,00,000 

20%

15%

₹10,00,001 से ₹12,50,000 

30%

20%

₹12,50,001 से ₹15,00,000 

30%

25%

₹15,00,000 से अधिक

30%

30%

निष्कर्ष

यह अध्याय आपको भारत में कर कानूनों की संरचना के बारे में एक बहुत ही मौलिक जानकारी देता है। भारत में कराधान प्रणाली नियमों का एक बहुत जटिल सेट है, और इस अध्याय में हमने देखा कि हर मुख्य मैट्रिक्स के तहत कई खंड और उपखंड हैं। फिर भी आपने एक चीज गौर की होगी - कुछ निवेश आपको कर लाभ दे सकते हैं। आप अपने निवेश की योजना सावधानीपूर्वक बनाने के लिए इसका उपयोग कर सकते हैंइससे आप अपने कर दायित्व को कम करने के साथ-साथ अपने पैसे को भी बढ़ा सकते हैं। आने वाले अध्यायों में इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

अब तक आपने पढ़ा

  • भारत में हर साल, 12 महीने की अवधि में अर्जित आय पर कर लगाया जाता है। किसी भी वर्ष के 1 अप्रैल से अगले वर्ष के 31 मार्च तक की इस अवधि को प्रीवियस इयर या वित्तीय वर्ष के रूप में जाना जाता है।
  • वित्तीय वर्ष के अगले वर्ष को निर्धारण वर्ष या असेसमेंट इयर कहा जाता है। यह वह वर्ष है जिसमें वित्त वर्ष की आय का आकलन किया जाता है।
  • हमारे देश में करों की देयता का निर्धारण करने में आपकी आवासीय स्थिति एक प्रमुख भूमिका निभाती है।
  • विशेष रूप से आय के पांच प्रमुख साधन हैं: वेतन से आय, घर की संपत्ति से आय, व्यवसाय या पेशे से लाभ, पूंजीगत लाभ और अन्य स्रोतों से आय।
  • वेतन आय में आपके वेतन के रूप में प्राप्त होने वाली सभी आय शामिल है। आपका मूल वेतन, ग्रेच्युटी, पेंशन, एन्यूटी, कमीशन, शुल्क, लीव एनकैशमेंट, और आपके नियोक्ता से प्राप्त होने वाला लाभ, सभी इस आय के दायरे में आते हैं। इसमें आपको दिए जाने वाले भत्ते भी शामिल होते हैं।
  • घर की संपत्ति से आय में किसी भी घर की संपत्ति से प्राप्त आय शामिल होता है।
  • आय का तीसरा प्रमुख जरिया है किसी व्यक्ति के व्यवसाय या पेशे से प्राप्त लाभ।
  • आपके नाम पर मौजूद पूंजीगत संपत्ति को बेचकर या ट्रांसफर करके आप जो मुनाफा कमाते हैं, वह पूंजीगत लाभ के रूप में कर योग्य है।
  • किसी भी प्रकार की आय जो इन श्रेणियों के अंतर्गत नहीं आती है, उन्हें अन्य स्रोतों से आय के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
  • उपरोक्त सभी पाँच श्रेणियों के अंतर्गत आनी वाली आय का योग, वित्तीय वर्ष की कुल आय के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
  • इससे पहले कि आप अपनी कुल आयकर की गणना कर सकें, आप उस आंकड़े से कुछ कटौती कर सकते हैं।
  • एक बार जब आप कुल आय से सभी योग्य रकम काट लेते हैं, तो आप कुल कर योग्य आय निकाल लेते हैं। फिर आपको उस स्लैब को देखना होगा जिसके अंतर्गत आपकी आय आती है और  उसके अनुसार कर की गणना करनी होगी।
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