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स्पेक्टर से लेकर शेयरहोल्डर तक

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प्रमोटर कौन हैं और इक्विटी मार्केट पर उनका प्रभाव

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कंपनियों को अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए पूंजी की जरूरत होती है, और इसीलिए शेयरधारक को कंपनी की इक्विटी में हिस्सेदारी के साथ-साथ डिविडेंड के रूप में अपने मुनाफे का एक हिस्सा और शेयरधारक की जनरल मीटिंग्स में वोट देने का अधिकार भी दिया जाता है। इस पूंजी को जुटाने के लिए कंपनियां प्रमोटरों की मदद लेती हैं। ये कंपनी की बाजार में जागरुकता बढ़ाने में मदद करते हैं, जिससे निवेशक को संबंधित इक्विटी सिक्योरिटी को खरीदने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।

क्या आपने कभी भी लोन लेने के लिए बैंक से संपर्क किया है? यह बैंक आमतौर पर प्रॉपर्टी, गोल्ड ज्वेलरी, शेयर या आपके किसी शेयर्स और निवेश को गारंटी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। कंपनी के प्रमोटर भी ठीक ऐसे ही हैं। भारत में, आज भी कई बड़ी कंपनियों की शेयरधारिता का एक बड़ा हिस्सा मूल संस्थापकों या प्रमोटर्स द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

कंपनी में उसके प्रमोटर्स की कितनी शेयरधारिता है ये जानना एक अहम शेयर विश्लेषण मापदंड है। और भारतीय कंपनियों में, जहां ज़्यादातर बिज़नेस अलग-अलग परिवार द्वारा चलाए जाते हैं, वहाँ शेयरधारिता यह दिखाती है कि प्रमोटर्स को बिज़नेस पर कितना भरोसा है और साथ ही साथ इससे लीडरशिप कंट्रोल की मज़बूती भी देखने को मिलती है।

एक कंपनी, जिसके प्रोमोटर के पास बहुत ज्यादा शेयरधारिता होती है वह यह संकेत देता है कि कंपनी के प्रमोटर को कंपनी का एक उज्ज्वल भविष्य दिखाई दे रहा है और इसलिए उसने इस कंपनी में इतनी शेयरहोल्डिंग ले रखी है ताकि भविष्य में वह इसके विकास से अच्छे पैसे कमा सके। इसके विपरीत, जब प्रमोटरों को अपनी कंपनियों के लिए अच्छे विकास की संभावनाएं नहीं दिखती हैं, तो वे अपनी हिस्सेदारी या पूरी कंपनी को प्रतियोगियों को बेच देते हैं।

प्रमोटरों का प्रकार

1 - पेनी प्रमोटर

पेनी प्रमोटरों की भूमिका को अक्सर नैतिक प्रथाओं के नज़रिए से बड़ी बारीकी से परखा जाता है। निवेशक पेनी स्टॉक्स को संदिग्ध नज़र से देखते हैं क्योंकि इन शेयरों के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं होती है। भारत में, जब हम पेनी स्टॉक की बात करते है तो उसका मतलब होता है कि वह स्टॉक जो की ₹10 से कम पर कारोबार करता हो। पेनी स्टॉक मार्केट में स्टॉक प्रमोटरों को काम में लिया जाना काफी आम है। वे शेयरों के बारे में बाजार में उत्साह पैदा करते हैं और इसे संभावित निवेशकों की नज़र में लाते हैं।

स्टार्ट-अप्स को बढ़ावा देने में पेनी प्रमोटरों की बहुत अहम भूमिका होती है। वे स्टार्ट-अप के भविष्य के प्रदर्शन के बारे में निवेशकों के बीच विश्वास पैदा करते हैं।

पेनी शेयरों में निवेश वैसे तो बहुत जोखिम भरा होता है, पर इससे आपको बहुत ज्यादा मुनाफा भी मिल सकता है। आपको बहुत आकर्षक या कम कीमत पर उन शेयरों में निवेश करने का मौका मिलता है जो अच्छे शेयर तो हैं ही, साथ ही साथ उनमें भविष्य में अच्छा प्रदर्शन करने की क्षमता भी है। इनमें से कुछ शेयरों में बहुत अधिक लेवल पर बढ़ने की क्षमता होती है, इससे आपका मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है। फिर, पेनी स्टॉक प्रमोटरों की आलोचना क्यों की जाती है?  ऐसा इसलिए है क्योंकि उनमें से कुछ प्रमोटर्स कंपनी के प्रदर्शन और वित्तीय मैट्रिक्स के बारे में गलत जानकारी को बढ़ावा देकर उन शेयरों का गलत व भ्रामक प्रचार करते हैं। यह निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ाता है।

2 - सरकारी सिक्योरिटीज़ में विशेषीकृत प्रमोटर

सरकारी सिक्योरिटीज़ में कारोबार करने की विशेषता रखने वाले प्रमोटर इन शेयरों को अक्सर नीलामी में खरीदते हैं और फिर खुदरा निवेशकों को ओवर-द-काउंटर बेचते हैं। यह प्रमोटर आरबीआई और उन सामान्य निवेशकों के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं जिनके पास आरबीआई के साथ सहायक जनरल लेजर (SLR) या चालू खाता (CA) नहीं हैं।

 3 - कैजुअल प्रमोटर

और कई बार अंत में सामान्य निवेशक ही केजुअल प्रमोटरों में बदल जाते हैं क्योंकि वह अपने दोस्तों या परिवारजनों को व्यक्तिगत शेयरों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। अगर कोई निवेशक किसी भी शेयर से अच्छा मुनाफा कमाता है तो वह इसे अपने साथी निवेशकों को बताता है, इससे कंपनी के शेयरों की डिमांड बढ़ती है।  

स्टॉक प्रमोटरों द्वारा उपयोग किए जाने वाले उपकरण

ऐसी कई मार्केटिंग रणनीतियां हैं जो शेयर प्रमोटर संभावित निवेशकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए काम में लेते हैं -

  • कोल्ड कॉलिंग: वे आने वाले आईपीओ, जी-सेक बांड, डेट सिक्योरिटीज़ और बहुत सी चीज़ों के बारे में जानकारी देने के लिए निवेशकों को कॉल करते हैं।
  • ई-मेल: ईमेल एक और ऐसा ऑप्शन है जो प्रमोटरों को बड़ी तादाद में लोगों तक जानकारी भेजने में मदद करता है।
  • सोशल मीडिया: आजकल स्टॉक प्रमोटर्स, निवेशकों को लुभाने और नए निवेश के अवसरों के बारे में बताने के लिए, सोशल मीडिया को बहुत काम में ले रहे है।
  • कंपनी की रिपोर्ट: कुछ स्टॉक प्रमोट करने वाली फर्म, कंपनियों के प्रदर्शन और फाइनेंशल स्टेटमेंट की एक डिटेल्ड रिपोर्ट बनाती है और उन्हें सार्वजनिक कर देती हैं।
 

 कैसे प्रमोटर अपनी शेयरधारिता को बढ़ाकर दिखाने के लिए गड़बड़ियों का उपयोग करते हैं?

1) कंपनी में प्रमोटरों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कंपनी (सार्वजनिक शेयरधारकों) के पैसे का उपयोग करना

2) अपनी वास्तविक शेयरधारिता की तुलना में प्रमोटरों की ज्यादा शेयरधारिता को दिखाने के लिए कर्मचारी कल्याण ट्रस्ट का उपयोग करना

3) कर्मचारी स्टॉक विकल्प (इसॉप) के जरिए कंपनी से सस्ती कीमत पर शेयर प्राप्त करना

4) शेयर वारंट के जरिए कंपनी से सस्ती कीमत पर शेयर प्राप्त करना

क्या प्रमोटरों की बढ़ती हिस्सेदारी हमेशा अच्छा संकेत होता है?

ज्यादा ताकत के साथ ज्यादा जिम्मेदारी भी आती है। हालांकि संभावित निवेशकों के लिए प्रमोटर बहुत ज्यादा प्रभावशाली होते हैं, लेकिन ये ध्यान में रखना अहम है कि कई बार वह एक झूठी तस्वीर भी पेश करते हैं जो निवेशकों को पेश किए गए अवसर को बाकियों के मुकाबले अधिक लाभाकारी दिखाती है। हिस्सेदारी में बढ़ोतरी का मतलब ये हो सकता है:

शेयर मूल्य को बढ़ावा देने के लिए बढ़ती हिस्सेदारी – ऐसा कई बार होता है जब प्रमोटर शेयर की कीमत को बढ़ाने के लिए बोली में ज्यादा शेयर खरीद लेते, जिसकी कीमत असल में कम होती है। शेयर खरीदना इस बात की भी पुष्टि नहीं करता है कि इस बिज़नेस में अच्छी संभावनाएं है और यह आपको एक अच्छा मुनाफा कमाकर देगा, बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि यह आपके पोर्टफोलियो में अनावश्यक शेयर को जोड़ दे।

सब्सक्राइब ना हुए राइट्स इश्यू को खरीदना - अगर कंपनी ने कोई इश्यू जारी किया है, लेकिन उसके निवेशकों ने इसे पूरी तरह से सब्सक्राइब नहीं किया है, तो प्रमोटर इश्यू को बचाने के लिए बचे हुए शेयर खुद खरीद लेते हैं, जिससे प्रमोटरों की हिस्सेदारी अपने आप बढ़ जाती है। इस तरह की बढ़ोतरी से निवेशकों को कुछ फर्क नहीं पड़ेगा।

उच्च डिविडेंड और प्रमोटरों की हिस्सेदारी के बीच संबंध – ज्यादा डिविडेंड देने वाली कंपनियों की सबसे ज्यादा मांग होती है, लेकिन इसी वजह से उनपर सबकी निगाह भी होती है। खासकर उन जगहों पर, जहां प्रमोटर शेयरधारिता में एक बड़ा हिस्सा रखते हों। ऐसे मामलों में कई बार, प्रमोटरों पर ज्यादा डिविडेंड बांटने और उससे ज्यादा मुनाफा कमाने का आरोप लगाया जाता है। हालाँकि, निवेशकों को डिविडेंड का हिस्सा भी मिलता है, लेकिन नुकसान यह है कि ज्यादा प्रमोटर शेयरधारिता के कारण शेयरों के कम लिक्विड होने से पूंजीगत लाभ कम हो सकता है।

निष्कर्ष

अब जब आप प्रमोटरों के बारे में जानते हैं और यह समझते हैं कि वह इक्विटी मार्केट को कैसे प्रभावित करते हैं, तो आइए उनके बारे में ध्यान रखने और इक्विटी बाजारों में उनकी भूमिका को समझने के लिए कुछ चीजें सीखें। इसके बारे में ज्यादा जानने के लिए आपको अगले अध्याय पर जाना होगा।

अब तक आपने पढ़ा

  1. प्रमोटर एक कंपनी के बारे में बाजार में जागरूकता पैदा करने में व्यवसायों की मदद करता है, जिससे निवेशक संबंधित इक्विटी सिक्योरिटीज़ को खरीदने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।
  2.  भारत में, कई बड़ी कंपनियों में आज भी शेयरधारिता का एक बड़ा हिस्सा मूल संस्थापकों या प्रमोटरों द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
  3.  ज्यादा प्रमोटर शेयरधारिता के साथ एक कंपनी अक्सर इस परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करती है कि प्रमोटरों को कंपनी के लिए उज्ज्वल भविष्य दिखाई देता है और वे इसकी अच्छी वृद्धि से मुनाफा कमाने का प्लान रखते हैं।
  4.  तीन प्रकार के प्रमोटर हैं- पेनी प्रमोटर, सरकारी सिक्योरिटीज़ में विशेषज्ञता रखने वाले प्रमोटर और केजुअल प्रमोटर।
  5.  प्रमोटर जनता के बीच कंपनी के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए कोल्ड कॉलिंग, ईमेल, सोशल मीडिया और कंपनी की रिपोर्ट जैसे उपकरणों का उपयोग करते हैं ।
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