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आखिरी पड़ाव: मूल्यांकन

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पिछले अध्याय में, हम ने विस्तार से फंडामेंटल एनालिसिस व उसके तरीकों के बारे में पढ़ा था और साथ ही साथ, यह जाना कि कैसे आप उन तकनीकों की मदद से, निवेश के लिए सही कंपनी चुन सकते हैं। हालाँकि, फंडामेंटल एनालिसिस का काम सिर्फ आपको सही शेयर लेने के लिए सलाह देने पर ही खत्म नहीं हो जाता। यह इस बात का अंदाज़ा लगाने में भी आपकी मदद करता है कि आपने जिस कीमत पर बाज़ार से शेयर ख़रीदा है, क्या वो इस कीमत के लायक है? और यही फंडामेंटल एनालिसिस का आखिरी पड़ाव है - मूल्यांकन।

जैसा कि आप पिछले अध्याय में पढ़ चुके हैं, मूल्यांकन और कुछ नहीं बल्कि वह प्रक्रिया है जिससे आप किसी कंपनी के शेयर के मूल्य का अंदाज़ा लगा सकते हैं। तो चलिए, आप ये तो जानते हैं कि मूल्यांकन क्या है, लेकिन एक निवेशक का इससे क्या लेना देना है? एक शेयर के मूल्य के बारे में जानकर निवेशक क्या हासिल कर सकता है? अगर यह सवाल आपके दिमाग में चल रहे हैं, तो फिक्र मत कीजिए, आपको सभी सवालों के जवाब इसी अध्याय में मिल जाएंगे। इस अध्याय में, हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि मूल्यांकन कैसे करें और मूल्यांकन क्यों ज़रूरी है।

आइए, एक उदाहरण के ज़रिए मूल्यांकन को बेहतर तरीके से समझें। एक शेयर, बाज़ार में ₹100 पर ट्रेड कर रहा है। आपको लगता है कि अभी इस शेयर की कीमत सही है और इसे बाज़ार से इस दाम पर ख़रीदा जा सकता है। लेकिन, आप कैसे जानते हैं कि शेयर की कीमत उसकी वैल्यू या मूल्य के हिसाब से सही है? हो सकता है शेयर का मूल्य ₹100 से कहीं ज़्यादा हो या उससे काफी कम। 

स्टॉक एक्सचेंज में कारोबार कर रहे शेयर की कीमत पर कई चीज़ें प्रभाव डालती हैं, जैसे बाज़ार का रुझान या डिमांड और सप्लाई। यहां तक ​​कि बहुत अच्छे फंडामेंटल वाले शेयर भी अपने मूल्य से बहुत कम कीमत पर कारोबार कर सकते हैं। मूल्यांकन इसी तरह की परिस्थितियों को पहचानने में आपकी मदद करता है। और आखिरी में, जब कीमतों में सुधार होता है, तो एक शेयर की बाज़ार में कीमत उसके वास्तविक, आंतरिक मूल्य के काफी करीब आ जाती है। 

अब जब आपको मूल्यांकन की एक अच्छी समझ हो गई है, तो चलिए, संक्षिप्त रूप में समझते है कि मूल्यांकन के पड़ाव तक कैसे पहुँचा जा सकता है ।

मूल्यांकन तक कैसे पहुँचें?

 यूँ ही, मूल्यांकन का अभ्यास करने से कुछ हासिल नहीं होगा। यकीन मानिए, आप केवल अपना समय और ऊर्जा बर्बाद कर रहे होंगे। इसलिए, इससे पहले कि आप मूल्यांकन पर जाएँ, आपको विस्तार से फंडामेंटल एनालिसिस की प्रैक्टिस करना ज़रूरी है। यह सुनिश्चित करता है कि कंपनी के पास अच्छा-खासा फाइनेंशल बैकअप है और भविष्य में इसके विकास की अच्छी संभावनाएं है। यहाँ एक प्रक्रिया बताई गई है जिसका पालन कर आप मूल्यांकन के चरण पर पहुँच जाएंगे:

  • एक कंपनी चुनिए, जिसका फंडामेंटल एनालिसिस आप करना चाहते हैं। 
  • उसकी लेटेस्ट वार्षिक रिपोर्ट पढ़ें और खास ध्यान कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर दें।
  • इसके प्रॉफ़िट और लॉस स्टेटमेंट, बैलेंस शीट और कैश फ्लो को पढ़ें और उसका विश्लेषण करें
  • अहम रेशियोज़ की गणना करें

जब आप इस प्रक्रिया को पूरा कर लेते हैं, तो आप यह आसानी से यह पता लगा सकते हैं कि क्या कंपनी आपकी अपेक्षाओं और शर्तों को पूरा करती है।

अगर कंपनी सफलतापूर्वक आपकी उम्मीदों पर खरा उतरती है, तो आप अगले चरण पर जा सकते हैं, जो कि मूल्यांकन है। नहीं तो, आप किसी दूसरी कंपनी को चुन कर इस प्रक्रिया को फिर से शुरू कर सकते हैं।

मूल्यांकन क्यों ज़रूरी है?

आप मूल्यांकन का एक फायदा तो पहले ही देख चुके हैं, यह आपको शेयर के ओवरवैल्यूड या अंडरवैल्यूड होने की जानकारी देता है। चलिए, मूल्यांकन के कुछ अन्य फायदों पर एक नज़र डालते हैं, जो आप जैसे निवेशकों के काम आ सकते हैं।

यह आपको कंपनी के रिस्क के कारकों का पता लगाने में मदद करेगा।

मूल्यांकन के तरीके, जैसे कि DCF शेयर मूल्यांकन कंपनी के ऋण और खर्चों को ध्यान में रखते हुए उसके फ्री कैश फ्लो का पता लगता है। ये उच्च ऋण या कम तरलता जैसे रिस्क फ़ैक्टर को आपकी नज़रों के सामने लाकर कंपनी से जुड़े जोखिम की पहचान करने में मदद करता है। 

 

यह वर्तमान बाज़ार मूल्य को ध्यान में नहीं रखता।

कई मूल्यांकन के तरीके, उस बाज़ार मू्ल्य को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिस पर कंपनी के शेयर कारोबार कर रहे होते हैं। इससे आपको कंपनी के शेयर के बारे में एक निष्पक्ष और उद्देश्य पूर्ण दृष्टिकोण मिलता है क्योंकि अब आप सिर्फ उन्हीं कारकों को देख रहे होते हैं जो कंपनी की मौलिक मज़बूती से जुड़े होते हैं, ना कि बाज़ार के रूझानों और मांग- आपूर्ति से। 

यह कंपनियों के तुलनात्मक विश्लेषण में मदद करता है

शेयर के मूल्यांकन के लिए जो तरीके काम में लिए जाते है वो मानकीकृत हैं यानी स्टैंडर्ड हैं और एक ही जैसा फ़ॉर्मूला काम में लेते हैं। जब आप इन तरीकों का इस्तेमाल करके आखिरी परिणाम पर पहुँचते है, तब आप इसकी तुलना प्रतियोगी कंपनियों से भी कर सकते हैं। इस तरह की तुलना आपको बेहतर निवेश निर्णय लेने में मदद करती है।

आने वाले अध्यायों में, हम डिस्काउंटेड कैश फ्लो (DCF) स्टॉक मूल्यांकन तरीके पर ध्यान देते हुए, मूल्यांकन के दूसरे तरीकों को देखेंगे। मूल्यांकन के तरीकों को बेहतर ढंग से समझने के लिए, आपके लिए टाइम वैल्यू ऑफ मनी के सिद्धांत को समझना ज़रूरी है और हम आने वाले सेगमेंट में इसके बारे में जानेंगे।

टाइम वैल्यू ऑफ मनी

टाइम वैल्यू ऑफ मनी का सिद्धांत लगभग सभी मूल्यांकन मॉडलों की नींव है। आइए, इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए एक उदाहरण लें।

मानिए, आप आज एक किलो सेब खरीदने के लिए बाज़ार जा रहे हैं। दुकानदार आपको ₹75 प्रति किलो का दाम बताता है। अगले साल लगभग उसी समय, आप फिर से एक किलो ताज़ा सेब खरीदने के लिए बाज़ार जाते हैं। आप अपने साथ ₹75 ले जाते हैं चूंकि आपने आखिरी बार एक किलो सेब ₹75 में खरीदे थे। हालांकि इस बार दुकानदार एक किलो सेब की कीमत ₹100 लगता है लेकिन वह ₹75 में आपको ¾ किलो सेब देने के लिए तैयार है।

तो, आज आप 1 किलो सेब ₹75 में ले सकते हैं, लेकिन अगले साल इसी समय पर, इतने ही पैसों में आप सिर्फ ¾ किलो सेब ही खरीद सकते होंगे।

आप इस स्थिति से क्या समझते हैं? दरअसल, दो चीजें हैं: 

  1. आज की तुलना में, भविष्य में पैसों की वैल्यू या पैसों की खरीदने की शक्ति कम होगी। 
  2. आपके ₹100, जो कि आप अगले साल कमाएँगे, वो आज के ₹75 के बराबर हैं।  

टाइम वैल्यू ऑफ मनी एक सिद्धांत है जो बताता है कि भविष्य के आपके पैसे का मूल्य आज के आधार पर कम क्यों है। इसी सिद्धांत पर मूल्यांकन का डिस्काउंटेड कैश फ्लो (DCF) तरीका काम करता है। यही कारण हैं कि यह मूल्यांकन किसी कंपनी की पूर्वानुमानित भविष्य की कमाई को आज के वर्तमान मूल्य में परिवर्तित कर देता है।

निष्कर्ष

टाइम वैल्यू ऑफ मनी के सिद्धांत को समझना आसान हैं। अगले अध्याय में, आपको यह बताएँगे कि भविष्य के कैश इनफ्लो को मौजूदा मूल्य पर कैसे आकते  हैं, साथ ही ये भी समझेंगे कि DCF मूल्यांकन मॉडल क्या है।

अभी तक आपने पढ़ा

  •   फंडामेंटल एनालिसिस का अंतिम पड़ाव ओर उद्देश्य सिर्फ आपको सही शेयर लेने में मदद करने तक ही सीमित नहीं है।
  •   यह आपकी यह जानने में मदद करता है कि आपने जिस कीमत पर कोई शेयर ख़रीदा है, वह उस कीमत के लायक है या नहीं।
  •   एक्सचेंज पर कारोबार कर रहे शेयर की कीमतों पर बाज़ार का रुझान और मांग और आपूर्ति प्रभाव डालते हैं। 
  •   इसलिए, कभी-कभी बहुत अच्छे फंडामेंटल वाले शेयर भी अपने मूल्य से कम कीमत पर कारोबार करते हैं। मूल्यांकन से आपको ऐसी परिस्थितियों की पहचान करने में मदद मिलती है।
  •   मूल्यांकन महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक कंपनी से जुड़े रिस्क फ़ैक्टर की पहचान करने में मदद करता है और कंपनियों का तुलनात्मक मूल्यांकन करने संभव बनाता है।
  • टाइम वैल्यू ऑफ मनी, मूल्यांकन से संबंधित एक अहम सिद्धांत है। यह बताता है कि भविष्य में पैसे का मूल्य, आज के आधार पर कम है।
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