बीमा से जुड़े नियम और कानून

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परिवर्तन या बदलाव ही दुनिया की एकमात्र स्थिर चीज़ है। और यह बात केवल व्यक्तियों पर ही नहीं बल्कि बीमा उद्योग पर भी लागू होती है।

भारत मे बीमा उद्योग की स्थापना के बाद से ही यह कई सुधारों के चरणों से गुज़री है और यह क्रम आजादी के पहले से चला आ रहा है। राष्ट्रीयकरण से लेकर निजीकरण तक, बीमा ने देश के फाइनेंस और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के विकास में बहुत योगदान दिया है। इसने पॉलिसीधारक को सुरक्षा तो प्रदान की ही है, साथ ही साथ सरकार की बचत में भी अपना एक विशेष योगदान दिया है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती रही है।

जबसे भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने देश की सभी बीमा-संबंधी नीतियों व मामलों का नियंत्रण करना शुरू किया था, यह बहुत साफ हो गया था कि बहुत से नए बीमाप्रादता भारतीय बीमा मार्केट में निवेश करेंगे।   

उदाहरण के लिए, बीमा उद्योग के निजीकरण के तुरंत बाद, कई नए बीमा प्रदाताओं ने बाजार में प्रवेश किया। उन्होंने पॉलिसीधारक को जीवन और गैर-जीवन बीमा दोनों ही तरह की पॉलिसी देकर मार्केट में अपनी जगह बनाई, जिसने बीमाप्रदाताओं के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा की।

और यहाँ पॉलिसीधारक के पक्ष की सुरक्षा के लिए आईआरडीएआई (IRDAI) ने इस मार्केट में कदम रखा और इन बीमा कंपनियों के कामकाज को नियंत्रित किया। इसके लिए IRDAI ने उन कानूनों को लागू किया, जिन्हें हर उस निकाय को मानना जरूरी था जिसे भारतीय बाजार में बीमा सेक्टर में काम करना था।

वैसे तो IRDAI मुख्य नियंत्रक है, लेकिन अन्य प्राधिकरण भी हैं जो बीमा उद्योग में कुछ विशेष मामलों पर नज़र बनाए रखते हैं।

भारतीय बीमा संघ: काम कर रही सभी बीमा कंपनियाँ जो भारत में बीमा सेवाएँ प्रदान कर रही हैं, वह भारतीय बीमा संघ की सदस्य हैं। यह एक सामान्य आचार सहिंता जारी करता है जो सभी बीमाकर्ताओं को अपने व्यवसाय में सही व्यवहार करने के प्रति मार्गदर्शित करता है।

टैरिफ सलाहकार समिति: जैसा कि नाम से ही पता चलता है , यह नियंत्रित निकाय बीमा प्रदाताओं द्वारा पॉलिसीधारकों को प्रदान किए जाने वाले हितों, प्रस्तावित लाभों, अवधि और कवर, नियमों और शर्तों पर नज़र रखता है।

लोकपाल: लोकपाल वह खंड निकाय है जो उपभोक्ताओं की शिकायतों को सुलझाने, बीमा क्लेम को निपटाने और यह देखने के लिए जिम्मेदार है कि बीमा प्रदाताओं द्वारा आचार संहिता का पूरी तरह से पालन किया जा रहा है या नहीं। ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसे उसके बीमा प्रदाता के खिलाफ शिकायत है तो, वह मामले की सुनवाई के लिए नियुक्त लोकपाल से मिल सकता है। मध्यस्थ के रूप में कार्य करके, दोनों पक्षों के बीच चल रहे टकराव को हल करना या कम करना ही लोकपाल की मुख्य भूमिका और कर्तव्य है।

अब, जब हम IRDAI की कार्यप्रणाली को व देश के बीमा क्षेत्र को पूरी निष्पक्षता के साथ किए जा रहे इसके नियंत्रण और संचालन की भूमिका को समझते है तो चलिए, बीमा के कानूनों और नियमों को थोड़ा करीब से जान लेते हैं-   

1. बीमा अधिनियम, 1938

बीमा अधिनियम 1938, एक विस्तृत कानूनी अधिनियम है जिससे हम उद्योग की बुनियादी ढ़ांचे और कार्यप्रणाली को समझ सकते हैं। इसमें व्यवसाय चलाने के लिए बीमाकर्ताओं और कानूनी निकायों के लिए दिशा निर्देश और कानूनी रूपरेखा शामिल है। इस अधिनियम को सबसे पहले स्वतंत्रता-पूर्व भारत की ब्रिटिश सरकार ने बनाया था।

2. भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999

IRDAI अधिनियम बीमा पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा, बीमा उद्योग के लगातार विकास को विनिमयित करने और व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए खुद को एक प्राधिकरण के रूप में स्थापित करता है; साथ ही साथ इससे जुड़े सभी मामलों और बीमा अधिनियम, 1938, जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 और सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 संशोधन के लिए भी काम करता है।

 

3. बीमा नियम, 1939

बीमा नियम 1939, यह बीमा के व्यवसाय से संबंधित कानूनों को और मज़बूत बनाने और उनमें सुधार लाने के लिए काम में आने वाला अधिनियम है। यह कानून समितियों, बिचौलियों की लाइसेंस देने और बीमा कंपनियों द्वारा अपने व्यवसायों के दौरान की जाने वाली प्रक्रिया को सही से संचालित करने के काम आता है।

4. लोक शिकायत निवारण नियम, 1998

जैसा कि इसके नाम से पता चलता है, यह अधिनियम विशेष रूप से शिकायतों को हल करने और बीमा प्रदाताओं के खिलाफ मौजूदा पॉलिसीधारकों की शिकायतों को दूर करने और उनके बीच के टकराव को कम करने के लिए है। यह  अधिनियम सामान्य बीमा कंपनियों और जीवन बीमा कंपनियों दोनों पर ही लागू होता है। इसी अधिनियम की वजह से, कंपनियों के पास विवादों व शिकायतों को सुलझाने के लिए और ग्राहक से अपने संबंधों को बेहतर बनाने और उन्हें संभालने के लिए एक खास टीम होती है जो भविष्य में भी इन्हीं मुद्दों पर सुचारु रूप से काम करती है।

5. बीमा अधिनियम संशोधित, 2015 

इस अधिनियम को पहली बार 2008 में वापस पेश किया गया था और 23 मार्च 2015 को अधिनियमित किया गया। यह अधिनियम प्रमुख रूप से आने वाले समय में विदेशी निवेश पर सीमा को 26% से बढ़ाकर 49% करने पर केंद्रित था। यह इसके अधिनियमन के बाद लागू हो गया था।

 इसके कुछ अन्य महत्वपूर्ण संशोधन इस प्रकार थे- 

-विदेशी निवेश सीमा में 26% से 49% तक वृद्धि

 -भारतीय बीमाकर्ता द्वारा जॉइंट वेंचर पर अनिवार्य नियंत्रण

 -वैकल्पिक प्रकार के कैपिटल साधनों की पेशकश

 -भारतीय भागीदारों के लिए 10 वर्षों के बाद 26% से अधिक की हिस्सेदारी के विनिवेश की आवश्यकता नहीं 

 -स्वास्थ्य बीमा एक अलग बीमा उत्पाद के रूप में स्थापित किया जाना 

 - विदेशी पुनर्बीमाकर्ताओं को स्व-स्वामित्व वाले शाखा कार्यालयों से संचालन करने अनुमति दी जाएगी

ये केवल बीमा के नियम और कानून थे। ये सभी एक साथ यह सुनिश्चित करते हैं कि आप बीमा कंपनियों या व्यक्तियों के किसी भी दुराचार या झांसे में ना फंसे। ये किसी भी गैर-कानूनी गतिविधियों और गलत व्यवहार को होने से रोकते हैं।

अगले अध्याय में, हम बीमा के करों और वित्त के बारे में जानेंगे जो किसी भी व्यक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है।

निष्कर्ष

अब जब आप बीमा के कानूनों और नियमों को जानते हैं, तो समय हो गया है कि हम अगले बड़े सवाल पर जाएं- बीमा से जुड़ा टैक्स और वित्त। इसके बारे में और जानकारी के लिए अगले अध्याय पर जाएं।

अब तक आपने पढ़ा

  1. राष्ट्रीयकरण से लेकर निजीकरण तक,  बीमा ने देश के वित्त और सकल घरेलू उत्पाद में प्रमुख योगदान दिया है।
  2. भारतीय बीमा संघ: यह व्यवसाय के लिए एक सामान्य आचार संहिता स्थापित करके सही प्रथाओं के प्रति बीमाकर्ताओं को मार्गदर्शन करता है।
  3. टैरिफ सलाहकार समिति: जैसा कि नाम से पता चलता है, यह नियंत्रित निकाय बीमा प्रदाताओं द्वारा पॉलिसीधारकों को प्रदान किए जाने वाले हितों, प्रस्तावित लाभों, अवधि और कवर, नियमों और शर्तों पर नज़र रखता है।
  4. लोकपाल वह खंड निकाय है जो उपभोक्ताओं की शिकायतों से निपटने, बीमा दावों का निपटान करने और बीमा प्रदाताओं के बीच आचार संहिता के उचित साधनों की जाँच करने के लिए जिम्मेदार है।
  5. बीमा अधिनियम, 1938, एक व्यापक कानून है जो उद्योग की बुनियादी संरचना और कामकाज को साझा करता है।
  6. IRDAI अधिनियम, बीमा पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा करने, उन्हें बढ़ावा देने और बीमा उद्योग के क्रमिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए एक प्राधिकरण की तौर पर खुद को स्थापित करता है।
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टिप्पणियाँ (2)

K.N. Shukla

16 Dec 2021, 11:29 PM

Not useful regarding investment

RUCHITA RATHOD

23 Aug 2021, 07:45 AM

Recap mentioned here is not as per chapter.

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