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विकल्प और वायदा का परिचय

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फ्यूचर्स और ऑपशंस क्या हैं?

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स्मार्ट मनी के मॉड्यूल 3 में हमने वास्तविक जीवन के उदाहरणों के साथ डेरिवेटिव, वायदा और विकल्पों की अवधारणाओं पर संक्षेप में चर्चा की। याद है सुधीर और भीम? और उन्होंने अनानास को खरीदने या बेचने के अधिकार या दायित्व का व्यापार कैसे किया था? यह अवधारणा, जब शेयर बाज़ार में लागू होती है, तो हमें वायदा और विकल्प की ओर ले जाती है।

इस मॉड्यूल में हम पूरी तरह से वायदा और विकल्प की मूल बातों पर ध्यान केंद्रित करेंगे और उनका मतलब देखेंगे। इसके अलावा, अवधारणाओं को बेहतर तरीके से समझने के लिए हम कुछ सैद्धांतिक डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स पर एक नज़र डालेंगे। वायदा के कॉन्सेप्ट के साथ शुरू करते हैं।

फ्यूचर्स/ वायदा क्या हैं?

शेयर बाज़ार में वायदा या फ्यूचर्स मूल रूप से डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट होता है जो एक खरीदार और एक विक्रेता को पूर्व निर्धारित कीमत पर और भविष्य में पूर्व निर्धारित तारीख पर एक कंपनी के शेयर का व्यापार करने के लिए बाध्य करता है। 

वायदा अनुबंध/ फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में चार मुख्य तत्व होते हैं:

  • खरीदार और विक्रेता का दायित्व
  • दो पक्षों के बीच एक अंडरलाइंग एसेट/ मूलभूत संपत्ति का व्यापार
  • पूर्व निर्धारित मूल्य की उपस्थिति
  • व्यापार के लिए पूर्व निर्धारित तिथि की उपस्थिति

और जहां तक फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट का संबंध है, तो कॉन्ट्रैक्ट का खरीदार वह व्यक्ति है जो एसेट खरीदने के लिए बाध्य है, जबकि फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट का विक्रेता वह व्यक्ति है जो एसेट को बेचने के लिए बाध्य है।

एक और ध्यान देने वाली बात यह है कि फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के खरीदार को उम्मीद होती है कि शेयर की कीमत बढ़ेगी। लेकिन कॉन्ट्रैक्ट के विक्रेता को उम्मीद होती है कि भविष्य में शेयर की कीमत में गिरावट आएगी। और इसलिए इन दोनों पार्टियां कीमतों को निर्धारित करते हुए एक समझौता करती हैं। 

आइए एक उदाहरण देखते हैं जो आपको इसे बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगा और फ्यूचर्स और ऑपशंस की मूल बातों के बारे में आपको मज़बूत जानकारी हो जाएगी।

वायदा/ फ्यूचर्स का उदाहरण

उदाहरण के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को ही ले लीजिए। मान लीजिए कि शेयर वर्तमान में ₹1700 प्रति शेयर पर कारोबार कर रहा है। आप उम्मीद करते हैं कि रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के शेयर की कीमत निकट भविष्य में बढ़ेगी और आप मौजूदा कीमत को लॉक इन करना चाहते हैं। 

इस मामले में आप क्या करते हैं? आप शायद एक फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट खरीदना चाहेंगे जो आपको निकट भविष्य में, जैसे एक महीने बाद, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का एक शेयर ₹1700 पर खरीदने के लिए बाध्य करेगा। 

और चूंकि आप मानते हैं कि उस समय पर शेयर की कीमत बहुत अधिक होगी, तो आपको विश्वास है कि यह फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट आपको उस ऊंची कीमत के बजाय, एक शेयर को ₹1700 पर खरीदने का मौका देकर मुनाफ़ा कमाने के काम आएगा। 

इस बीच राम, जो एक और व्यापारी है, उसे उम्मीद है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के शेयर की कीमत निकट भविष्य में घट जाएगी। तो राम क्या करता है? वह एक फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट बेचना चाहेगा जो उसे रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के एक शेयर को भविष्य में जैसे,एक महीने बाद, ₹1700 पर बेचने के लिए बाध्य करेगा। 

और चूंकि राम मानता है कि उस समय पर शेयर की कीमत बहुत कम होगी, इसलिए उसका मानना ​​है कि यह फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट उसे उस समय की कम कीमत पर एक शेयर बेचने की बजाय, ₹1700 में एक शेयर बेचने की अनुमति देकर मुनाफा कमाने में मदद कर सकता है।

तो आप और राम दोनों एक फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के लिए सहमत होते हैं जिसमें ये चार मुख्य तत्व हैं:

  • आप और राम दोनों, लेन-देन के अपने व्यक्तिगत दायित्वों को पूरा करने के लिए बाध्य हैं।
  • लेन-देन मूल रूप से रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के एक शेयर का व्यापार है।
  • शेयर के लिए पूर्व निर्धारित मूल्य ₹1700 है।
  • व्यापार के लिए पूर्व निर्धारित तिथि आज से एक महीना बाद की है।

कॉन्ट्रैक्ट करने के लिए आप और राम, दोनों को अपने संबंधित शेयर ब्रोकरों के साथ लेन-देन के मूल्य का एक प्रतिशत जमा करना ज़रूरी है। यह राशि जिसे आपको जमा करने की आवश्यकता है, उसे ‘मार्जिन’ के रूप में जाना जाता है। इस मार्जिन को कॉन्ट्रैक्ट के सिक्योरिटी डिपॉज़िट के रूप में माना जाता है। राम, जो आपको फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट बेचता है, एसेट बेचने के लिए बाध्य है। आप कॉन्ट्रैक्ट के खरीदार होने के नाते, आप शेयर खरीदने के लिए बाध्य हैं। 

एक महीने के अंत में व्यापार के लिए पूर्व निर्धारित तिथि पर आपको ₹1700 पर शेयर खरीदना होगा, भले ही वह बाज़ार में ₹1500 की कम कीमत पर कारोबार कर रहा हो। इसी तरह राम भी आपको ₹1700 में शेयर बेचने के लिए बाध्य होगा, भले ही यह बाज़ार में यह ₹1800 की अधिक कीमत पर कारोबार कर रहा हो। 

 

विकल्प/ ऑप्शंस क्या हैं?

शेयर बाज़ार में विकल्प/ ऑपशंस डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट खरीदार को भविष्य में एक पूर्व निर्धारित तिथि पर एक पूर्व निर्धारित कीमत पर कंपनी के शेयर को खरीदने या बेचने का अधिकार देता है। यहां खरीदार के पास एसेट खरीदने या बेचने का विकल्प होता है जबकि विक्रेता के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होता है।

  • अगर ऑपशंस कॉन्ट्रैक्ट का खरीदार एसेट खरीदने या बेचने के अपने अधिकार का प्रयोग करता है तो कॉन्ट्रैक्ट का विक्रेता उसे पूरा करने के लिए बाध्य है।
  • और अगर कॉन्ट्रैक्ट के खरीदार ने अपने अधिकार का उपयोग नहीं करने का विकल्प चुना है तो भी विक्रेता को उसके अनुसार कार्य करना होगा। 

यहां ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट में अनिवार्य चार मुख्य तत्व हैं:

  • ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट के खरीदार का अधिकार
  • दो पक्षों के बीच एक अंडरलाइंग एसेट का व्यापार
  • पूर्व निर्धारित मूल्य की उपस्थिति
  • व्यापार होने के लिए पूर्व निर्धारित तिथि की उपस्थिति

फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के विपरीत, एक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट में कॉन्ट्रैक्ट का खरीदार, एसेट का विक्रेता या खरीदार दोनों हो सकता है। दूसरे शब्दों में, कॉन्ट्रैक्ट का खरीदार एसेट खरीदने या एसेट बेचने का अधिकार खरीद सकता है।

अगर कॉन्ट्रैक्ट खरीदार, कॉन्ट्रैक्ट विक्रेता से एसेट खरीदने का अधिकार खरीदता है, तब कॉन्ट्रैक्ट विक्रेता स्वचालित रूप से एसेट का विक्रेता बन जाता है। और अगर कॉन्ट्रैक्ट खरीदार, कॉन्ट्रैक्ट विक्रेता को एसेट बेचने का अधिकार खरीदता है, तो कॉन्ट्रैक्ट विक्रेता अपने आप ही एसेट का खरीदार बन जाता है। 

निष्कर्ष

हमने दो सबसे बुनियादी सवालों के जवाब देखे हैं - ऑप्शंस क्या हैं? और फ्यूचर्स क्या हैं? ऑप्शंस के संबंध में, अधिकार के आधार पर (चाहे वह एसेट खरीदने का हो या बेचने का) ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट दो प्रकार के हो सकते हैं:

  • कॉल ऑप्शन
  • पुट ऑप्शन

अगले अध्याय में हम फ्यूचर्स और विकल्प की मूल बातों पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। और प्रत्येक प्रकार के कॉन्ट्रैक्ट्स के बारे में जानेंगे और उन्हें बेहतर तरीके से समझने के लिए उदाहरण देखेंगे

अब तक आपने पढ़ा

  • शेयर बाज़ार में वायदा/ फ्यूचर्स मूल रूप से डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट होते हैं जो एक खरीदार और विक्रेता को भविष्य में एक पूर्व निर्धारित तारीख पर, एक पूर्व निर्धारित कीमत पर कंपनी के शेयर का व्यापार करने के लिए बाध्य करते हैं। यहां खरीदार और विक्रेता दोनों कॉन्ट्रैक्ट के अपने लेने-देन को पूरा करने के लिए बाध्य हैं।
  • फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में मूल रूप से चार मुख्य तत्व होते हैं: खरीदार और विक्रेता का दायित्व, दो पक्षों के बीच एक मूलभूत संपत्ति का व्यापार, एक पूर्व निर्धारित मूल्य की उपस्थिति और व्यापार के लिए एक पूर्व निर्धारित तिथि की उपस्थिति। 
  • फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के खरीदार को उम्मीद है कि शेयर की कीमत बढ़ जाएगी। लेकिन कॉन्ट्रैक्ट के विक्रेता को उम्मीद है कि भविष्य में शेयर की कीमत में गिरावट आएगी।
  • शेयर बाज़ार में ऑप्शंस डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट वो कॉन्ट्रैक्ट है, जो इसके खरीदार को भविष्य में एक पूर्व निर्धारित तिथि पर, एक पूर्व निर्धारित मूल्य पर कंपनी के शेयर को खरीदने या बेचने का अधिकार देता हैं। यहां खरीदार के पास संपत्ति खरीदने या बेचने का विकल्प होता है जबकि विक्रेता के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होता है।
  • अगर ऑप्शंस डेरिवेटिव का खरीदार संपत्ति खरीदने या बेचने के अपने अधिकार का प्रयोग करता है तो कॉन्ट्रैक्ट का विक्रेता उसके अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।
  • और अगर कॉन्ट्रैक्ट के खरीदार ने अपने अधिकार का उपयोग नहीं करने का विकल्प चुना है तब भी विक्रेता को उसके अनुसार कार्य करना होगा।
  • एक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट के लिए अनिवार्य चार मुख्य तत्व हैं: ऑप्शंस कॉन्ट्रै्क्ट के खरीदार का अधिकार, दो पक्षों के बीच एक मूलभूत संपत्ति का व्यापार, एक पूर्व निर्धारित मूल्य की उपस्थिति और एक पूर्व निर्धारित तिथि की उपस्थिति।
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