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विकल्प और वायदा का परिचय

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विकल्प ट्रेडिंग क्या हैं? कॉल और पुट विकल्प सीखिए

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अब जब आप जानते हैं कि विकल्प क्या हैं और वो वायदा से कैसे भिन्न है, तो आइए कॉल और पुट ऑप्शन की मूल बातें जानते हैं और उनसे जुड़ी प्रक्रिया को समझने की कोशिश करते हैं। मूल रूप से आप जानते हैं कि कॉल ऑप्शन और पुट ऑप्शन होते हैं। अगर आप अनिश्चित हैं कि निकट भविष्य में बाज़ार किस दिशा में बढ़ेगा, तो आप दोनों ऑप्शन ही खरीद सकते हैं और अपने नुकसान को कम करने का प्रयास कर सकते हैं। या अगर आपके पास भविष्य के बाज़ार ट्रेंड के बारे में एक निश्चित अनुमान है, तो आप बाज़ार की चाल के आधार पर कॉल या पुट ऑप्शन में से कोई एक खरीद सकते हैं। 

कॉल और पुट ऑप्शन की मूल बातें समझना और यह सीखना कि ये किस तरह काम करते हैं, डेरिवेटिव मार्केट में आए नए व्यापारियों के लिए उपयोगी हो सकता हैं, और वे उचित ऑप्शन ट्रेडिंग रणनीति तैयार कर सकते हैं। चलिए, इसे विस्तार में जानते हैं। 

कॉल ऑप्शन का उदाहरण

एक कॉल ऑप्शन खरीदार को एसेट खरीदने का अधिकार देता है। दूसरी ओर, ऑप्शन के विक्रेता के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होता, और ये ऑप्शन उसे खरीदार को एसेट बेचने के लिए बाध्य करता है (अगर खरीदार, खरीद के अपने अधिकार का उपयोग करता है)।

अपने अधिकारों का समर्पण करने के बदले में ऑप्शन के विक्रेता, ऑप्शन खरीदार से एक निश्चित राशि लेते हैं, जिसे 'प्रीमियम' कहा जाता है। इस 'प्रीमियम' राशि को ऑप्शन विक्रेता द्वारा क्षतिपूर्ति के लिए एक किस्म का सिक्योरिटी डिपॉज़िट माना जाता है। 

आइए कॉल ऑप्शनों की अवधारणा को बेहतर ढंग से समझने के लिए एक उदाहरण देखते हैं।

मान लीजिए कि अंबुजा सीमेंट का शेयर आज ₹200 पर कारोबार कर रहा है। निकट भविष्य, जैसे एक महीने में आप इस शेयर की कीमत बढ़ने की उम्मीद करते हैं। इसलिए आप आज की वर्तमान कीमत को लॉक इन करना चाहते हैं, ताकि आप भविष्य में इस शेयर को आज की कम कीमत पर खरीद सकें। 

हालांकि आप सतर्क भी हैं इसलिए आप दूसरी संभावना का भी ध्यान रखना चाहते हैं कि अगर कीमतों में गिरावट आती है तो क्या होगा? इसलिए आप भविष्य में ₹200 में शेयर खरीदने का विकल्प (बाध्यता नहीं) चाहते हैं। 

यहां एक ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट आपकी मदद कर सकता है। और इस तरह का ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट- जो आपको भविष्य में एक पूर्व निर्धारित कीमत पर एक एसेट खरीदने का अधिकार देता है उसे कॉल ऑप्शन के रूप में जाना जाता है।

इस बीच राम एक और व्यापारी है और वह 100% निश्चित है कि अंबुजा सीमेंट के शेयरों की कीमत निकट भविष्य में गिर जाएंगी। दूसरे शब्दों में, वह एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट चाहता है जो उसे एक महीने बाद ₹200 में शेयर बेचने में मदद करेगा। क्योंकि उसका मानना है कि उस वक्त कीमत बहुत कम होगी।

तो आप दोनों एक कॉन्ट्रैक्ट करते हैं। आप राम से कॉल ऑप्शन खरीदते हैं। दूसरे शब्दों में, आप अभी से एक महीने के बाद ₹200 में अंबुजा सीमेंट का शेयर खरीदने का अधिकार खरीदते हैं। उस समय तक आप शेयर की कीमत के ₹200 से अधिक होने की उम्मीद करते हैं। इसी समय राम आपको अंबुजा सीमेंट का ₹200 का शेयर खरीदने का अधिकार देता है। 

यह मूल्य (₹200) ऑप्शन के स्ट्राइक पाइस के रूप में जाना जाता है।

यहां आप ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट के खरीदार और एसेट के खरीदार हैं। जबकि राम ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट का विक्रेता और एसेट का विक्रेता है।

आपको शेयर खरीदने का अधिकार बेचकर राम शेयर बेचने के लिए खुद को बाध्य कर रहा है । और आपके शेयर ना खरीदने का विकल्प चुनने के मामले में, राम को जो नुकसान होगा वह उसके लिए मुआवज़े के रूप में आपसे प्रीमियम राशि के तौर पर ₹20 चार्ज करता है। 

  • एक महीने के अंत में अगर कीमत ₹200 से अधिक है (मानिए ₹250) तो इस मामले में आप ₹200 की कम कीमत पर शेयर खरीदने के अपने अधिकार का उपयोग कर सकते हैं ।
  • लेकिन एक महीने के अंत में अगर कीमत ₹200 से कम है (मानिए ₹180), तो इस मामले में आप ₹200 की अधिक कीमत पर शेयर खरीदने के अपने अधिकार का प्रयोग करना नहीं चुनेंगे। 
  • चूंकि आपने अपने ऑप्शन का प्रयोग नहीं किया है इसलिए राम वह प्रीमियम रख लेगा जिसे आपने कॉन्ट्रैक्ट करते वक्त मुआवज़े के रूप में दिया था।
  • आप जो भी निर्णय लेते हैं , राम कॉन्ट्रैक्ट का विक्रेता होने के नाते उसके अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।
 

पुट ऑप्शन का उदाहरण

पुट ऑप्शन क्या है? कॉल ऑप्शन के विपरीत एक पुट ऑप्शन, ऑप्शन के खरीदार को एसेट बेचने का अधिकार देता है। दूसरी ओर, ऑप्शन के विक्रेता के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होता है और अगर ऑप्शन का ख़रीदार बेचने के अपने अधिकार का उपयोग करने का निर्णय लेता है तो विक्रेता ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट द्वारा एसेट खरीदने के लिए बाध्य है। 

अपने अधिकारों को छोड़ने के बदले में ऑप्शन का विक्रेता, ऑप्शन खरीदार से एक निश्चित राशि वसूलता है, जिसे 'प्रीमियम' कहा जाता है। इस प्रीमियम राशि को खरीदार के अपने ऑप्शन का प्रयोग नहीं करने की स्थिति में ऑप्शन विक्रेता को होने वाले नुकसान के लिए एक तरह का सिक्योरिटी डिपॉज़िट मान सकते हैं।

आइए पुट ऑप्शनों को समझने के लिए एक बार फिर अंबुजा सीमेंट का उदाहरण लेते हैं। 

एक बार फिर मानिए कि आज अंबुजा सीमेंट का शेयर ₹200 पर कारोबार कर रहा है। निकट भविष्य में, जैसे एक महीने बाद, आप इस शेयर की कीमत के गिरने की उम्मीद करते हैं, तो आप इसे आज के मूल्य पर लॉक करना चाहते हैं ताकि आप भविष्य में इसे ऊंची कीमत पर बेच सकें।

हालांकि सतर्क होने की वजह से आप दूसरी परिस्थिति की भी संभावना को ध्यान में रखते हैं कि क्या होगा अगर कीमतें इससे ज्यादा बढ़ती हैं? इसलिए आप भविष्य में शेयर को ₹200 में बेचने का विकल्प चाहते हैं (बाध्यता नहीं)।

एक बार फिर, एक ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट यहां सहायक हो सकता है। और इस तरह का एक ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट जो आपको भविष्य में पूर्व निर्धारित तिथि पर, एक पूर्व निर्धारित मूल्य पर एक एसेट को बेचने का अधिकार देता है उसे पुट ऑप्शन के रूप में जाना जाता है।

इस बीच राम एक और व्यापारी है और वह 100% निश्चित है कि अंबुजा सीमेंट के शेयरों की कीमत निकट भविष्य में बढ़ेंगी। दूसरे शब्दों में, वह एक कॉन्ट्रैक्ट करना चाहता है जो उसे एक महीने बाद ₹200 में शेयर खरीदने में मदद करेगा, क्योंकि उसका मानना ​​है कि उस समय कीमत बहुत अधिक होगी।

अब आप दोनों एक कॉन्ट्रैक्ट करते हैं। आप राम से पुट ऑप्शन खरीदते हैं। दूसरे शब्दों में, आप अब से एक महीने में ₹200 में अंबुजा सीमेंट के शेयर को बेचने का अधिकार खरीदते हैं। आप उम्मीद करते हैं कि उस समय तक कीमत ₹200 से कम होगी।इस बीच राम आपको ₹200 में अंबुजा सीमेंट का शेयर बेचने का अधिकार देता है।

यहां आप ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट के खरीदार और एसेट के विक्रेता हैं। जबकि राम ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट का विक्रेता और एसेट का खरीदार है।

आपको शेयर बेचने का अधिकार बेचकर राम इस प्रक्रिया में खुद को शेयर खरीदने के लिए बाध्य करता है। और अगर आप शेयर बेचने के अपने अधिकार का उपयोग नहीं करते हैं तो राम, उससे होने वाले नुकसान के लिए एक मुआवज़े के रूप में आपसे ₹20 की प्रीमियम राशि चार्ज करता है। 

  • एक महीने के अंत में अगर कीमत ₹200 से कम (मानिए ₹180 प्रति शेयर) होती है तो इस मामले में आप अधिक कीमत पर शेयर बेचने के अपने अधिकार का प्रयोग करेंगे।
  • लेकिन एक महीने के अंत में अगर कीमत ₹200 से अधिक ( मानिए ₹250) होती है तो इस मामले में आप कम कीमत पर शेयर बेचने के अपने अधिकार का प्रयोग नहीं करेंगे।
  • चूंकि आपने अपने ऑप्शन का प्रयोग नहीं किया है इसलिए राम उस प्रीमियम को रख लेगा है जिसे आपने कॉन्ट्रैक्ट करते समय मुआवजे के रूप में उसे दिया था।
  • आप जो भी निर्णय लेते हैं राम कॉन्ट्रैक्ट का विक्रेता होने के नाते उसके अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।

निष्कर्ष

इसके साथ ही, हम कॉल और पुट की मूल बातों पर इस अध्याय के अंत पर आते हैं। वायदा, कॉल ऑप्शन और पुट ऑप्शन की अवधारणा अब इतनी जटिल नहीं लगती है, है ना? अगले कुछ अध्यायों में हम एक कॉल ऑप्शन और एक पुट ऑप्शन को लेंगे और देखेंगे कि उनका कारोबार करने से आपको किस तरह का रिटर्न मिलता है। तब तक, हमारे साथ जुड़े रहिए।

अब तक आपने पढ़ा

  • कॉल और पुट ऑप्शन की मूल बातें समझना और यह सीखना कि ये किस तरह काम करते हैं, डेरिवेटिव मार्केट में आए नए व्यापारियों को उचित ऑप्शन ट्रेडिंग रणनीति तैयार करने में मदद कर सकता है।
  • एक कॉल ऑप्शन, ऑप्शन के खरीदार को एसेट खरीदने का अधिकार देता है।
  • दूसरी ओर, ऑप्शन के विक्रेता के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है और वह ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट द्वारा खरीदार को एसेट बेचने के लिए बाध्य है (अगर खरीदार, खरीद के अपने अधिकार का उपयोग करता है)।
  • अपने अधिकारों को छोड़ देने के बदले में, ऑप्शन का विक्रेता, ऑप्शन खरीदार से एक निश्चित राशि लेता है, जिसे 'प्रीमियम' कहा जाता है। 
  • कॉल ऑप्शन के विपरीत, एक पुट ऑप्शन खरीदार को एसेट बेचने का अधिकार देता है।
  • दूसरी तरफ, ऑप्शन के विक्रेता के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होता है और अगर कोई व्यक्ति बेचने के अपने अधिकार का प्रयोग करने का निर्णय लेता है तो ऑप्शन विक्रेता एसेट खरीदने के लिए बाध्य है।
  • अपने अधिकारों को छोड़ देने के बदले में, ऑप्शन का विक्रेता, ऑप्शन खरीदार से एक निश्चित राशि लेता है, जिसे 'प्रीमियम' कहा जाता है।
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